Thursday, September 26, 2013

नारी स्वावलम्बन और समस्याएँ

आलेख

नारी स्वावलम्बन और समस्याएँ

- स्वप्ना नायर *
नारी स्वावलम्बन और समस्याएँ:

पति और पत्नी एक दूसरे के साथ भावनात्मक संबंध सूत्र में बंधकर एक प्रत्यक्ष अस्थायी और तर्कपूर्ण समझौते के बंधन में बंधने लगे और परिवार नितांत अस्वाभाविक और औपचारिक ढंग से संगठित होने लगे, जिनमें पति-पत्नी का संबंध केवल यौन आवश्यकताओं की सामयिक पूर्ति का साधन भर बन गया।
आज जिन परिवारों में पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं – वहाँ  आर्थिक सम्पन्नता भले ही अन्य परिवारों की अपेक्षा अधिक हो, पर दाम्पत्य जीवन के सुखद क्षणों में कमी आ रही है। दोनों अपने-अपने काम से जब घर लौटते हैं तो थकावट और काम के दबाव के कारण उनमें नीरसता आती है। वे दिन भर कड़ी मेहनत करके जो थोड़ा समय पाते हैं वो उसमें विश्राम करना पसंद करते हैं। केवल थकावट भरी नींद और घड़ी द्वारा अनुशासित भागदौड़ भरा सवेरा। ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन में तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है और पारिवारिक जीवन कलह ग्रस्त हो जाते हैं। ऐसा ही उदाहरण है जेनेन्द्र का कल्याणी उपन्यास के असरानी दम्पति के बीच उत्पन्न होने वाली कटुता का प्रमुख कारण उनकी अत्यधिक व्यस्तता और व्यावसायिकता ही है।
असरानी अपनी पत्नी कल्याणी से कहता है – कानून हिन्दू स्त्री को हक नहीं देता पैसे पर अधिकार मेरा है। तुम समझती हो कि तुम कमाती हो... खैर अदालत की सहायता से ही मैं अपना अधिकार प्राप्त करूँगा... क्योंकि मैं कहूँगा की मेरे दस्तखत फर्जी हैं... तुम रह सकती हो। पर मातहत बनकर नहीं तो नहीं।
स्वावलम्बन और अच्छी आय के बावजूद डॉ. कल्याणी का दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं है। यशपाल के झूठा सच के कनक तथा जयदेव पुरी का दाम्पत्य संबंध तो अत्यधिक व्यस्तता के कारण टूट ही जाता है।
पति-पत्नी अलग-अलग शहरों में नौकरी करते हैं वहाँ दाम्पत्य जीवन के सुखद क्षण और सीमित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में परस्पर संदेह और अविश्वास के अवसर बढ़ जाते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि या तो परिवार टूट कर किन्हीं दूसरी झकाइयों से जुड़ते हैं और नया परिवार बनाते हैं या नितांत नीरस ढ़ंग से औपचारिक सम्बन्ध रखते हुए भी स्वच्छंद जीवन व्यतीत करते हैं।
इसके अतिरिक्त विभिन्न अन्तर्बाह्य परिस्थितियों के दबाव के कारण परम्परागत पारिवारिक सामंजस्य की भावना का भी उन परिवारों में ह्रास होता जा रहा है, जहाँ पति और पत्नी दोनों ही आत्मनिर्भर हैं। कभी-कभी तो नारी स्वावलम्बी न होकर भी अपनी शिक्षा दीक्षा और समाज में व्यवसाय के बढ़ते हुए अवसरों को देखकर अपने अह्म और अपनी स्वच्छंदता का इस सीमा तक विकास कर लेती है कि उसके व्यक्तित्व में सहनशीलता और सामंजस्य की भावना का अभाव उत्पन्न हो जाता है। जो पारिवारिक दाम्पत्य संबंधों के स्थायित्व के लिए इस प्रकार का अपशकुन ही सिद्ध होता है। अमृतराय के नागफनी का देश की बेला और रंजीत के दाम्पत्य संबंधों की कटुता का एक बड़ा कारण बेला का उपर्युक्त अंह भाव ही है। बेला का अपनी शिक्षा दीक्षा के कारण विश्वास है कि वह कभी भी आत्मनिर्भर हो सकती है। इसी विश्वास के बल पर वह रंजीत के प्रति पूर्णतया असहिष्णुता का व्यवहार करती है। परिणामतः एक दूसरे के लिए भार बन जाते हैं, बेला कहती है – मैं अपनी रोटी कमा सकती हूँ, मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए। मैं दुम नहीं हिला सकती किसी के सामने नहीं हिला सकती। कोई मुझसे दो हाथ दूर हटे, तो मैं बीस हाथ हटने को तैयार रहती हूँ।  इन वाक्यों से पता चलता है कि बेला में अहं का भाव है।
आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र नारी समस्याएँ

पत्नी ही नहीं, अविवाहित लड़की भी आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो जाने पर अपने ऊपर अभिभावक का कोई नियंत्रण नहीं स्वीकार करती। इसके दुष्परिणाम पारिवारिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में भी देखे जा सकते हैं। एक ओर उदाहरण से इसे स्पष्ट कर सकते हैं।
उपर्युक्त नारी वर्ग में अधिकांश अपनी परिस्थितियों को ही अपनी नियति मानकर उनके प्रति समर्पित हो जाती हैं। पर त्यागपत्र की मृणाली, मनुष्य के रूप की सीमा और आखिरी दाँव की चमेली व्यवस्था की एक खाई से निकलकर दूसरी खाई में गिर पड़ती हैं।
पति और परिवार से पलायन के बाद उन्हें जीवन में टिकने का स्वस्थ आधार नहीं मिल पाता, एक प्रकार की वेश्यावृति ही उनकी नियति बन जाती है। एक तीसरी स्थिति उस नारी वर्ग की भी है जिसका प्रतिनिधित्व यशपाल के झूठा सच की तारा करती है। तारा को परम्परागत व्यवस्था की घुटन की सामना करना पड़ता है। उसे भी पलायन के बाद ठिकाने का आधार नहीं मिल पाता। उसे भी अन्य स्त्रियों की तरह पुरुष की बर्बरता और पाश्विकता का सामना करना पड़ता है। तारा का अन्तर यह है कि तारा एक मूक पशु नहीं, जागरूक और शिक्षता नारी है जो अपने आपको परिस्थितियों के उथल-पुथल में समर्पित करती है।
तारा का यही व्यक्तित्व वास्तव में व्यवस्था की सडन में कूटे हुए उस अंकुर की भांति है जिसकी विकासशीलता नयी पौध की नयी अवस्थाओं तथा नये मूल्यों का जीता-जागता आदर्श साबित होता है।
वेश्यावृत्ति समस्या

हमारी संस्कृति में नारी का अपने रूप और यौवन को जीविका और ऐश का साधन बनाने की प्रथा नहीं हैं। समूची सामंती व्यवस्था इस सडांस से ग्रस्त है। परंतु आज वेश्याओं को पश्चिम से आयातित कालगर्ल तथा सोसायटी गर्ल जैसे नये-नये नाम दे दिए गए हैं और उनकी वृत्ति का ढंग भी बहुत कुछ परिवर्तित हो गया है। इसके अतिरिक्त वेश्या न कही जाने वाली सभ्य और गृहस्थ वेश्याओं की परंपरा भी नयी है। आधुनिकता के उन्मेष ने नारी और वेश्या के बीच की दीवार को बहुत पतली कर दिया है। अमृतलाल नागर के बूँद और समुद्र की कम्या के अनुसार अब नारी केवल वेश्या रह गई है। कहाँ की बराबरी? यह बराबरी भी एक झूठा ढोंग है। इस बराबरी में वेश्या में स्त्री अब स्त्री न रहकर गुड़िया रह गई है। पुराने आचार-विचारों ने उसे दासी और वेश्या बनाया था, अब वह महज वेश्या रह गई है।
वर्तमान युग में औद्योगीकरण के संदर्भ में यदि देखा जाए तो इसके प्रमुख कारण हैं – पूंजीवादी समाज व्यवस्था, व्यक्ति की आवश्यकताओं में आकस्मिक वृद्धि, अत्यधिक व्यावसायिकता तथा पश्चिम के वर्जनाहीन समाज के अनेक आयातित प्रभाव आदि।
भारत के वर्तमान युग की पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ अनेक ऐतिहासिक और सामाजिक कारण भी रहे हैं जो परिवेश में संघर्ष करती हुई नारी को अंत में वेश्यावृत्ति के कगार परला खड़ा करते हैं। इस संबंध में हिन्दी के उपन्यासों में बहुचर्चित पांडेय बैचेन शर्मा उग्र के फागुन के दिन चार की रोजी।
भगवती प्रसाद वाजपेयी के टूटा टी सेट की नीलकमल, भगवतीचरण वर्मा के आखिरी दौर की चमेली और राधा, यशपाल के मनुष्य के रूप की सीमा, अज्ञेय के अपने-अपने अजनबी की योके, कमलेश्वर की डाक बंगला की इरा और शीला आदि ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जिन्हें अपनी परिस्थितियों से विवश होकर वेश्याओं या सम्पन्न लोगों की रखैलों का जीवन व्यतीत करना पड़ता है। राधा, रोजी, इरा और शीला की विवशताएँ अपने मौलिक रूप में आर्थिक ही है।
सेठ शिवकुमार की रखैल बन राधा अपने मनोभाव व्यक्त करती है क्योंकि उसका पति कमाऊ नहीं है पैसे की दुनिया है। पैसा भगवान है, पैसा धर्म है, पैसा इंसान है, पैसा सब कुछ खरीद सकता है – राधा ने अपनी रूप जवानी बेच दी – पैसे के आगे वह अपने को रोक न सकी। उसे बेचनी ही पड़ी।
वर्तमान युग की विवशताजन्य वेश्यावृत्ति सामंती व्यवस्था की विवशताजन्य वेश्यावृत्ति का एक नया बढ़ोत्तरी रूप है। इतना ही नहीं वर्तमान युग के अर्थ पिशाचों की वासनापूर्ति के लिए नारी का विधिवत् व्यवसाय भी होने लगा है ठीक उसी प्रकार जैसे भेड़-बकरियों का।
  
विवाह की समस्या

वर्तमान युग की परिवर्तित होती हुई अर्थ व्यवस्थाओं एवं समाज व्यवस्थाओं के कारण वैवाहिक परिस्थितियों में भी क्रांतिकारी परिवर्तन उपस्थित हुआ।
विवाह अब पुरुष के लिए प्रेम और यौन आवश्यकताओं की पूर्ति और नारी के लिए आर्थिक संरक्षण का एक मात्र साधन रह गया।
विवाह के लिए कभी सम्पन्नता विपन्नता की अपेक्षा व्यक्ति की जाति, धर्म, कुल, संस्कार तथा व्यक्तिगत गुणों को अधिक महत्व दिया जाता था। वर का स्वाजातीय और पुरुषोचित्त गुणों से मंडित होना जितना आवश्यक था उतना ही कन्या में शील और सफल गृहिणी के संस्कार अपेक्षित थे। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के लिए पूरक का आदर्श लेकर जीवन में उतरते थे।
विषमताएँ उन युगों में भी थी, मुख्यतया उच्च वर्ग में पर साधारण गृहस्थ का दाम्पत्य जीवन आज की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी और कहीं अधिक समन्वित था।
आज औद्योगिकरण और व्यावसायीकरण की प्रवृत्तियों को बढ़ते हुए चरण ने दाम्पत्य जीवन की सारी सुख शांति छीनकर विवाह की व्यर्थता प्रमाणित कर दी। उदाहरण से इसे स्पष्ट कर सकते हैं। यशपाल के झूठा सच की कुन्ती अपने लिए चुने गए वर से विवाह करना केवल इसलिए अस्वीकार करती है कि उसकी आय सीमित है। वह कहती – लड़के की पचहत्तर तनख्वाह है, भत्ता मिलाकर सौ हो जाता होगा। इतना बड़ा उनका परिवार है। घर में भैंस है। नौकर एक भी नहीं... बहिन जी ऐसा ब्याह करके चौके-बर्तन, बोबर में जिंदगी खपा देने से क्या सुख मिल जाएगा।
कमलेश्वर के डाक बंगला की इरा जो बतरा से शादी न कर उसकी रखैल बन कर रहती है मानती है कि शादी से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। बिना विवाह और आत्मिक संबंध के भी दो व्यक्ति केवल शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार पर एक दूसरे के साथ जीवन बिता सकते हैं। मनोभाव व्यक्त करते हुए कहते हैं – भावनाओं के बुलबुले शारीरिक सम्पर्क के लिए काफी होते हैं और एक साथ दोहरी जिंदगी चल सकती है। किसी को न चाहते हुए भी दुनिया की बातें ठीक चलती रह सकती है और शादी से कोई बड़ा फर्क नहीं आता क्योंकि शादी से आत्मा का कोई बड़ा सम्बंध नहीं हैं।

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 स्वप्ना नायर कर्पगम विश्व विद्यालय, कोयम्बत्तूर डॉ. पद्मावति अम्माल के निर्देशन में पी.एचडी. उपाधि के लिए शोधरत हैं ।

3 comments:

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 27/09/2013 को
विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः24 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : एक जादुई खिलौना : रुबिक क्यूब

मदन मोहन सक्सेना said...

सुन्दर.अच्छी रचना.रुचिकर प्रस्तुति .; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ
कभी इधर भी पधारिये