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Wednesday, July 25, 2012

विश्व हिंदी सम्मेलन में चर्चा के विषय


विदेश मंत्रालय दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी शिक्षा संघ एवं अन्य भागीदारों के सहयोग से 22-24 सितम्बर 2012 को जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में 9वां विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित कर रहा है। सम्मेलन का आयोजन सैंडटन कन्वेन्शन सेंटर, दूसरा तल, मौड स्ट्रीट, सैंडटन-2196, जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में किया जाएगा।

9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के प्राचीन एवं आधुनिक पहलुओं से संबंधित परम्परागत और समसामयिक दोनो प्रकार के विषयों पर चर्चाएं होंगी। सम्मेलन का विषय 'भाषा की अस्मिता और हिन्दी का वैश्विक संदर्भ' रखा गया है। सम्मेलन में नौ शैक्षिक सत्र होंगे। शैक्षिक सत्रों के विषय इस प्रकार होंगेः

1. महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ

2. हिंदीः फिल्म, रंगमंच और मंच की भाषा

3. सूचना प्रौद्योगिकीः देवनागरी लिपि और हिंदी का सामर्थ्य

4. लोकतंत्र और मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी

5. विदेश में भारतः भारतीय-ग्रंथों की भूमिका

6. ज्ञान-विज्ञान और रोजगार की भाषा के रूप में हिंदी

7. हिंदी के विकास में विदेशी/प्रवासी लेखकों की भूमिका

8. हिंदी के प्रसार में अनुवाद की भूमिका

9. दक्षिण अफ्रीका में हिंदी शिक्षा-युवाओं का योगदान।


      विश्व शांति, अहिंसा, समानता और सम्पूर्ण मानव जाति के न्याय के लिए लंबे समय तक महात्मा गांधी द्वारा और उनके जीवन से प्रभावित दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति डा. नेल्सन मंडेलाद्वारा चलाए गए संघर्ष को देखते हुए सम्मेलन के उद्घाटन स्थल का नाम गांधीग्राम, पूर्ण सत्र हॉल का नाम नेल्सन मंडेला सभागार तथा अन्य सत्रों वाले स्थलों का नाम शांति, सत्य, अहिंसा, नीति और न्याय रखा गया है।


Thursday, July 19, 2012

9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के 'लोगो' और 'वेबसाइट' का लोकार्पण समारोह


Ninth World Hindi Conference
22-24 September, 2012
Johannesburg [South Africa]


9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के 'लोगो' और 'वेबसाइट' का लोकार्पण समारोह


18 जुलाई 2012 को नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में माननीय विदेश राज्य मंत्री श्रीमती प्रनीत कौर द्वारा 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के 'लोगो' और 'वेबसाइट' का लोकार्पण किया गया। सम्मेलन 22-24 सितम्बर, 2012 को जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन का विषय है 'भाषा की अस्मिता और हिन्दी का वैश्विक संदर्भ'।

विश्व हिन्दी सम्मेलनों की सार्थकता के बारे में बोलते हुए श्री सत्यव्रत्त चतुर्वेदी, संसद सदस्य एवं 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की संचालन समिति के सदस्य ने कहा कि किसी भी देश की संस्कृति और भाषा उसकी पहचान परिभाषित करती है। विश्व भर में, भारत की पहचान भी उसकी सामासिक संस्कृति और भाषा से है।
इस अवसर पर बोलते हुए विदेश राज्य मंत्री श्रीमती प्रनीत कौर ने कहा कि हालांकि विश्व हिन्दी सम्मेलनों में अधिक से अधिक लोग भाग ले रहे हैं फिर भी इन सम्मेलनों में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों तथा युवाओं को शामिल करने तथा आकर्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मीडिया के साथ बातचीत के दौरान मंत्री जी ने कहा कि विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित करना हमारे लिए गर्व की बात है क्योंकि यह हमारे देश की राजभाषा है। उन्होंने यह भी कहा कि ये विश्व हिन्दी सम्मेलन अब तक ऐसे देशों में आयोजित किए गए है जिनमें भारतीय समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हैं और जिनके लिए ऐसे सम्मेलनों का विशेष महत्व है। 
इससे पहले मंत्री महोदया ने सम्मेलन के 'लोगो' और 'वेबसाइट'www.vishwahindisammelan.gov.in का लोकार्पण किया। यह वेबसाइट हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में है। इस पर सम्मेलन से संबंधित सभी ब्यौरा उपलब्ध है जैसेकि शैक्षिक सत्रों के विषय और कार्यक्रम, भारत और अन्य देशों के प्रतिभागियों द्वारा पंजीकरण कराने की प्रक्रिया, आवास, परिवहन, वीजा आदि। वेबसाइट के अभिलेखागार भाग में विगत में आयोजित सभी आठ विश्व हिन्दी सम्मेलनों का विवरण शामिल है।
विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के बाद इस सम्मेलन के 'लोगो' का चयन किया गया था। विजेता प्रविष्टि का डिज़ाइन जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुम्बई के श्री जोग शुभानन्द गोपाल द्वारा किया गया था। मंत्री महोदया द्वारा श्री जोग को नकद पुरस्कार प्रदान किया गया।

इस अवसर पर संसद सदस्य, 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए गठित संचालन समिति एवं उपसमितियों के सदस्य, प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान, लेखक, पत्रकार, वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

Friday, July 15, 2011

संस्कृत ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद


प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव"विदग्ध" ने किया

संस्कृत ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद


जबलपुर. नि.प्र. ,श्रीमद्भगवत्गीता विश्व ग्रंथ के रूप में मान्यता अर्जित कर चुका है , गीता में भगवान कृष्ण के अर्जुन को रणभूमि में दिये गये उपदेश हैं , जिनसे धर्म , जाति से परे प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की चुनौतियो से सामना करने की प्रेरणा मिलती है . परमात्मा को समझने का अवसर मिलता है . जीवन मैनेजमेंट की शिक्षा गीता से मिलती है .
भारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं ! महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! पर यदि काव्यानुवाद शंलोकशः भावानुवाद हो तो वह आनंद यथावत बना रहता है , और यही कर दिखाया है प्रो सी बी श्रीवास्तव ने .नयी पीढ़ी संस्कृत नही पढ़ रही है , और ये सारे विश्व ग्रंथ मूल संस्कृत काव्य में हैं , अतः ऐसे महान दिशा दर्शक ग्रंथो के रसामृत से आज की पीढ़ी वंचित है . प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवत गीता , रघुवंशम्, मेघदूतम् जैसी महान रचनाओ का श्लोकशः हिन्दी भाव पद्यानुवाद का महान कार्य करके काव्य की उसी मूल भावना तथा सौंदर्य के आनंद के साथ हमारे सांस्कृतिक ज्ञान ,व प्राचीन साहित्य को हिन्दी जानने वाले पाठको के लिये सुलभ करा दिया है . यह कार्य ८४ वर्षीय प्रो. श्रीवास्तव के सुदीर्घ संस्कृत , हिन्दी तथा काव्यगत अनुभव व ज्ञान से ही संभव हो पाया है . यद्यपि प्रो श्रीवास्तव इसे ईश्वरीय प्रेरणा , व कृपा बताते हैं . मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" जी ने महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् के समस्त १२१ मूल संस्कृत श्लोकों का एवं रघुवंश के सभी १९ सर्गों के लगभग १८०० मूल संस्कृत श्लोकों का तथा श्रीमद्भगवत गीता के समस्त १८ अध्यायो के सारे श्लोको का श्लोकशः हिन्दी गेय छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद कर हिन्दी के पाठको के लिये अद्वितीय कार्य किया है !शासन हर वर्ष कालिदास समारोह , तथा संस्कृत के नाम पर करोंडों रूपये व्यय कर रहा है ! जन हित में इन अप्रतिम अनुदित कृतियों को आम आदमी के लिये संस्कृत में रुचि पैदा करने हेतु इन पुस्तकों को इलेक्र्टानिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना चाहिये , जिससे यह विश्व स्तरीय कार्य समुचित सराहना पा सकेगा !प्रो श्रीवास्तव ने अपने ब्लाग http://vikasprakashan.blogspot.com पर अनुवाद के कुछ अंश सुलभ करवाये हैं . ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनंद अलग ही है ,उन्होने बताया कि इन ग्रंथो के पुस्तकाकार प्रकाशन के लिये उन्हें प्रकाशको की तलाश है . उनका पता हैप्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तवओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर . म.प्र. भारत पिन ४८२००८फोन ०७६१२६६२०५२ , मोबाइल ०९४२५८०६२५२email vivekranjan.vinamra@gmail.com
-विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, May 30, 2011

अपनी भाषा के उपयोग में झिझक कैसी ?

अपनी भाषा के उपयोग में झिझक कैसी

(साभार - दैनिक भास्कर)

(दैनिक भास्कर भिलाई संस्करण में दि.29 मई, 2011 को प्रकाशित)


Sunday, July 20, 2008

युग मानस में अब सभी विधाओं की रचनाएँ प्रकाशित होंगी

युग मानस अब शीघ्र ही सभी विधाओं की रचनाओं से आपको स्वागत करेगा । मौलिक अप्रकाशित रचनाओं को वरीयता दी जाएगी । उत्कृत प्रकाशित रचनाएँ भी भेजी जा सकती हैं । चूँकि यह अव्यावसायिक अनुष्ठान है, रचनाकारों को मानदेय देना संभव नहीं है ।