Sunday, May 8, 2011

श्यामल सुमन जी की एक कविता - माँ



माँ





-श्यामल सुमन





मेरे गीतों में तू मेरे ख्वाबों में तू,
इक हकीकत भी हो और किताबों में तू।
तू ही तू है मेरी जिन्दगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।

तू न होती तो फिर मेरी दुनिया कहाँ ?
तेरे होने से मैंने ये देखा जहाँ।
कष्ट लाखों सहे तुमने मेरे लिए,
और सिखाया कला जी सकूँ मैं यहाँ।
प्यार की झिरकियाँ और कभी दिल्लगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।

तेरी ममता मिली मैं जिया छाँव में।
वही ममता बिलखती अभी गाँव में।
काटकर के कलेजा वो माँ का गिरा,
आह निकली उधर, क्या लगी पाँव में ?
तेरी गहराइयों में मिली सादगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।

गोद तेरी मिले है ये चाहत मेरी।
दूर तुमसे हूँ शायद ये किस्मत मेरी।
है सुमन का नमन माँ हृदय से तुझे,
सदा सुमिरूँ तुझे हो ये आदत मेरी।
बढ़े अच्छाइयाँ दूर हो गन्दगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।


3 comments:

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत सुंदर है आपकी रचना धन्यवाद !

Navin said...

बहुत ही सुंदर रचना.

जिसको नही देखा हमने कभी, फिर उसकी जरुरत क्या होगी, हे, मां, तेरी सुरत से अलग, भगवानकी मुरत क्या होगी?
... गाना याद आ गया.

श्यामल सुमन said...

दर्शन कौर जी, नवीन जी - आपके शब्द - मेरे कलम की उर्जा। प्रिय जयशंकर जी को बिशेष स्नेह जो अनुकूल वातावरण न होते हुए भी हिन्दी के लिए सार्थक काम कर रहे हैं और मुझ जैसे सामान्य रचनाकार को प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं। यूँ ही स्नेह बनाये रखें।
सादर
श्यामल सुमन
+919955373288
www.manoramsuman.blogspot.com