Thursday, April 1, 2010

साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति

- राम शिव मूर्ति यादव*


पुरस्कारों की समाज में प्राचीनकाल से ही एक लम्बी परम्परा रही है। उत्कृष्ट व सृजनात्मक कार्य को सम्मानित-पुरस्कृत करके जहाँ सम्बन्धित व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं अन्य लोगों हेतु यह एक नजीर भी पेश करता है। पुरस्कार भावनात्मक, आर्थिक या अन्य किसी भी रूप में हो सकते हैं। सभ्यता के विकास के साथ ही पुरस्कारों के रूप, उद्देश्य व प्रयोजन में भी मात्रात्मक परिवर्तन होते गये। साहित्य में रचनाधर्मिता भी पुरस्कारों से अछूती नहीं है। कभी-कभी तो रचना स्वयं किसी के सम्मान में कही जाती है, यहाँ पर रचना स्वयं में पुरस्कार बन जाती है।

साहित्य को पुरस्कृत करना मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों की पहचान को दर्शाता है। साहित्य कई तत्वों से संचालित होती है और आधुनिक दौर में एक तत्व पुरस्कार भी शामिल हो गया है। स्वत:सुखाय लिखकर पन्ने फाड़ने वाले साहित्यकार अतीत की चीज हो गये हैं, अब तो साहित्य बकायदा लिखा ही नहीं जाता, बल्कि प्रायोजित भी किया जाता है। आजकल रचनाधर्मिता स्वानुभूति मात्र नहीं होती बल्कि इसमें सहानुभूति का तत्व भी जुड़ गया है। साहित्य संवेदनाओं, स्वानुभूति और सहानुभूति की त्रिविलि में एक बाजार तैयार करता है। बाजार की इस दौड़ में साहित्य की पहचान सिर्फ पाठक ही नहीं बल्कि पुरस्कार और सम्मान भी निर्धारित करते हैं।

साहित्य में आज पुरस्कारों की भीड़ सी हो गई है और इसे लेने वालों में भी होड़ मची है। कभी पुरस्कारों की राजनीति राजधानियों में ही दिखती थी परन्तु अब तो लगता है कि पुरस्कारों का भी विकेन्द्रीकरण हो गया है। राजधानियों से ज्यादा साहित्यिक संस्थायें तेजी से उभरते नगरों और कस्बों में विद्यमान हैं। इन संस्थाओं के लिए पुरस्कार एक ऐसी वस्तु के समान है, जिसके माध्यम से वे लोगों को सम्मानित कर स्वयं उपकृत होते हैं, कारण इनके पीछे लोगों से प्राप्त धनराशि। वस्तुत: पुरस्कार बटुये में रखे उन सिक्कों की तरह हो गये हैं, जिन्हें किसी मंदिर में चढ़ाकर ईश्वर को सम्मानित किया जाता है, परन्तु इसके पीछे अपनी दानशीलता का ढिंढोरा पीटकर स्वयं को सम्माननीय बनाने की भावना छुपी होती है।

पुरस्कारों की दौड़ ने साहित्य को कोई सार्थक लाभ तो नहीं पहुँचाया परन्तु इसकी ओट में तमाम व्यक्ति, संस्थायें एवं शासन-प्रशासन में पदासीन लोग अवश्य लाभान्वित हो रहे हैं। आज पुरस्कार लोगों की हैसियत के आधार पर बंटने लगे हैं, जितना बड़ा नाम उतना बड़ा पुरस्कार। सरकारी संस्थाओं द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों में जाति, धर्म, क्षेत्र व सत्ताधारी दल की राजनीति इतनी बुरी तरह पैठ कर गई है कि एक बारगी सोचना पड़ता है कि इस सम्मान से साहित्य का कोई उध्दार होगा भी या नहीं। किसी ने क्या खूब कहा भी है कि उस पुरस्कार या सम्मान का कोई अर्थ नहीं, जिससे साहित्य की कोई कोंपल भी नहीं हिले।

पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर ही पढ़ने को मिल जाता है कि अमुक साहित्यकार किसी रोग से ग्रस्त होकर अपने अन्तिम दिन गिन रहा है और साहित्य के नाम पर रोटी सेंकने वाले मठाधीश और सरकार को उसका हाल-चाल लेने की फुर्सत ही नहीं। गौर कीजिए, जब कोई राजनैतिक व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होता है तो सुबह से शाम तक उससे मिलने वालों की भीड़ लगी रहती है, इसमें उसके विरोधी राजनैतिक दल के भी शीर्ष नेता शामिल होते हैं। इसे चाहे राजनेताओं की एकता कहें या अवसरवादिता, दुर्भाग्यवश साहित्य के क्षेत्र में यह नजारा विरले ही मिलता है। शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाह खान की प्रतिभा की दुनिया कायल है, परन्तु जीवन के अन्तिम दिनों में जिस तरह से अपने बेटे के लिए उन्होंने एक अद्द सरकारी नौकरी की सरकार से अपेक्षा की, वह इस देश की साहित्य-कला-संस्कृति का चेहरा दिखाने के लिए काफी है। असलियत यही है कि जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी सृजनता में लगा दी, उनकी कोई पूछ तक नहीं जबकि राजधानियों में रहकर येन-केन-प्रकरेण तमाम सम्मानों व पुरस्कारों से नवाजे जाते लोग, विभिन्न अकादमियों में बिठाये गये लोग या साहित्य-कला-संस्कृति के नाम पर सरकारी धन पर विदेशों की सैर करते लोगों के अवदान का मूल्यांकन किया जाय तो जो सच्चाई सामने आयेगी, वह समाज को आईना दिखाने के लिए काफी है।

हम यह भूल जाते हैं कि भारत गाँवों का देश है। ग्रामीण स्तर पर जितनी प्रतिभायें सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ रही हैं, यदि उन्हें समुचित मार्गदर्शन व संसाधन उपलब्ध कराये जायें तो साहित्य के क्षेत्र में तमाम नये प्रतिमान स्थापित हो सकते हैं। सवाल यह है कि यह कार्य कौन करेगा? एक व्यवस्था के तहत यह किसी व्यक्ति के बलबूते की बात नहीं। अन्तत:, बात सरकार के पाले में जाती है, जहाँ वो लोग बैठे हैं जो अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने का गुमान पाले हुए हैं। ऐसे में उनसे ऐसे किसी रचनात्मक कदम की उम्मीद रखना व्यर्थ ही है।

साहित्य की तमाम विधायें लिखी जाती रही हैं और लिखी जाती रहेंगी। कोई भी पुरस्कार या सम्मान इनकी आवाज को तात्कालिक रूप से भले ही दबा ले, पर सृजनधर्मिता पुन: अपनी जीवटता के साथ खड़ी हो जाती है। यह अनायास ही नहीं है कि तमाम क्रान्तियों से पहले साहित्य के द्वारा लोगों को जागृत किया जाता है। पुरस्कार साहित्य की तकदीर नहीं लिखते पर इतना अवश्य है कि क्षणिक रूप में ही सही वे उसे प्रोत्साहन देते हैं। ऐसे में यदि प्रोत्साहन ही गलत लोगों को मिलने लगे तो सार्थक साहित्य कहाँ से उभरेगा? पुरस्कारों की राजनीति बन्द होनी चाहिए और उन्हें ही पुरस्कृत करना चाहिए, जो वाकई इसके हकदार हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य-कला-संस्कृति किसी भी समाज की रीढ़ हैं और यदि रीढ़ को ही कमजोर करने की कोशिशें की जायेंगी तो इस पर आधारित किसी भी समाज को भहराने में देरी नहीं लगेगी।



*स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्त

तहबरपुर, पोस्ट- टीकापुर आजमगढ़
(उ0प्र0)-276208

1 comment:

Rashmi Singh said...

बेहद प्रासंगिक लेख..अभी दिल्ली का तमाशा चल ही रहा है.