Tuesday, June 7, 2011

कविताएँ - कांच के टुकड़े


कांच के टुकडे


डॉ.बशीर/Dr.S.Basheer
प्रबंधक (राजभाषा)/Manager (OL)
हिन्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन/HPCL
दक्षिणांचल/South Zone


1. हम भरे बाजार में दिल में
दीप जलाकर बैठे हैं ।
जो चाहे तो, घर को रोशन कर लें
वर्ना घर को राख में बदल डाले

2. हमें अपने घावों पर ‘मरहम’
लगाने की फुर्सत नहीं,
चिराग बन जलते जा रहे हैं
हवा की कोशिश रही, हमें बुझा डाले
फिर भी तुम्‍हारे आंसू देखकर ‘मर हम’ गये ।


3. कितने गर्दिशों से मैंने अपने को बचा रखा था
तेरे सलूक ने हमें चक्रव्‍यूह में फंसा दिया ।
अब निकलने की बात कौन सोचें ......... !
मरने के तरीके ढूंढ रहे हैं ।


4. उनकी यादों में हम झूम झूम के
पागल से, देवदास बन गये
आंसू पी-पीकर थक कर सो गये
लड़खड़ाते चलते गये
हालात देख जमाना कहता है कि
लो फिर से पीकर आ गया है ।


5. आदमी रोते हुए पैदा होता
जिंदगी भर शिकायत करते जीता
दौड-धूप में खुद के आंसू पीता
पछताते हुए मर जाता ।


6. जिद की भी होती है कुछ हद
न होता जिसका कोई मकसद
अति हो तो जीवन होता बर्बाद ।
खामखाह होता जंगे-फसाद ।



7. प्‍यार एक सागर
जिसकी न कोई गहराई
जिंदगी एक ज़हर है
उसकी की न कोई रिहाई ।

8. कामयाबी का जल तेरी प्‍यास बुझाएगा
आज नहीं तो कल, नहीं कोई मुश्किल
अभी दूर नहीं तेरी मंजिल
आंधियां हैं बेशुमार तेरी राह पर,
मिलेंगे कई बुझ दिल
फिर भी आशा का आकाश दीप
तू जलाते रहना ।
आगे बढ़ते जाना
कारवा बनाते जाना ।

9. कामयाबी के लिए खुद करना मेहनत
खुदा तो सिर्फ कोरा कागज़ देता
खुद को उसमें रंगीन तस्‍वीर बनाना है
अपनी तकदीर को सज़ाना है ।



10. जहां में जमीन ज़ायदाद कमा लों
ऐशो आराम कर लो
मौज मस्‍ती मना लों ।
झूमो, नाचों, गावो, खाओ प्‍यारे ।
बस इतना याद करना
कबर में, सेफ लाकर नहीं होते ।


11. नज़रे बने तो नज़ारे बने
हुस्‍न बने तो दीवाने बने
बुतों के लिए बुत खाने बनें
प्‍यार करने वालों के लिए पागल खाने बने ।


12. तूफान में कस्‍ती को किनारे भी मिलते हैं ।
गर्दिशों को कई सितारे भी मिलते हैं ।
आंसूओं को सहारे भी मिलते हैं
दुनियां में सबसे प्‍यारी न्‍यारी यारी है जिंदगी ।
इससे भी खूब सूरत दिलदार मिलते हैं ।



13. हमेशा उसके होठों पर
मुस्‍कान की तितलियां नज़र आती रहीं
लोग समझ लेते हैं कि मस्‍तमौला है बिंदास है
लेकिन कितने लोगों से देखा है कि
पत्‍थर के सीने सभी चश्‍में निकलते है ।


14. मकसदे मिराज हो फिर भी
सबके साथ हाथों में हाथ,
कदम से कदम मिलाकर चल
शोहरत तेरे कदम चमेगी
मेंहदी तेरी जरूर रंग लायेगी
फूल सा खिल, तेरों से मिल
तेरी राह पर काटें है उन पर चलकर गुलाब खिलाना
कभी अपना मनोबल खोना
सदा आगे बढ़ते जाना ....... चलते जाना
जरूर अपने मकसदे-ए-मंजिल को पाना ।

No comments: