Monday, May 25, 2015

समकालीन कहानी : पहचान के कुछ बिंदु

आलेख
समकालीन कहानी : पहचान के कुछ बिंदु

- लालू तोमस*

किसी  भी साहित्यिक प्रवृत्ति या विधा के विकास को पिछले चरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक अगला चरण पिछले चरण का विकास ही होता है। सन साठ के बाद आयी कथा-पीढ़ी 1964-65 ई0 तक अपने को पूरी तरह प्रतिष्ठित कर आधुनिक हिंदी कहानी को नया तेज, शक्तिमत्ता और नया तेवर प्रदान कर उसे समकालीन कहानी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। इस प्रकार समकालीन कहानी नयी कहानी के विकास का अगला चरण है। समकालीनता नवलेखन के संदर्भ में  प्रयुक्त अत्यंत परिचित शब्द है। समकालीनता अपने मूल अर्थ में अंग्रेजी के कंटेंपोरेनिटी’ (Contemporaneity)  का समतावाची है, जिसका अर्थ है उसी समय या कालखंड में होनेवाली घटना या प्रवृत्ति या एक ही कालखंड में जी रहे व्यक्ति। लेकिन समकालीन कहानी-आंदोलन से जुडे कुछ कहानीकार और आलोचकों ने समकालीन के कालपरक अर्थ को नकारकर समकालीनता को एक प्रवृत्तियुक्त धारणा मानकर विशेष अर्थ-गौरव से युक्त किया। लेकिन आज 1960 ई0 के बाद के साहित्य केलिए समकालीन संज्ञा प्रचलन में आ चुकी है।

    दरसल समकालीन हिंदी कहानी समकालीन समय के दवाब से निर्मित मनुष्य और समाज की कलात्मक एवं वैचारिक निर्मिति है। समकालीन कहानी का अध्ययन अपने समय और समाज का भी अध्ययन है। समकालीन कहानी जीवन के यथार्थ को बडी गहराई से रूपायित करती है। इसलिए समकालीन कहानियों में वर्तमान युग की सभी विसंगतियों का बडा हृदय विदारक वर्णन हुआ है। फलतः कहानी की नयी पीढ़ी ने जिस यथार्था को अभिव्यक्त किया, वही नयी कहानी की मुख्य विभाजक भूमि थी। यथार्थ चित्रण के इस बदलाव को मुख्य विभाजक रेखा मानते हुए यहाँ उन प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करने का प्रयास किया जा रहा है जो समकालीन कहानी को नयी कहानी से पृथक करते हैं ।
     युग जीवन के बदलते यथार्थ का चित्रण - समकालीन कहानी में जीवन-यथार्थ का कोई भी अंग अनछुआ नहीं रहा है। सामान्य मनुष्य की जिन्दगी में जीवन जीने की विषम आर्थिक स्थितियाँ, नैतिक रूढियों और मान्यताओं का विघटन, व्यक्ति के जीवन में घर कर गयी निराशा, महानगरीय जीवन और उसकी विविधमुखी समस्याएँ, भ्रष्ट राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था के प्रति तीव्र असंतोष, प्रेम और सेक्स का नूतन भाव-बोध, खंडित पारिवारिक संबंध आदि जीवन की अनेक स्थिथियों का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण समकालीन कहानियों में मिलता है। समकालीन कहानिकारों ने युग-जीवन के बदले हुए यथार्थ को वाणी देना अपना कर्तव्य समझा क्योंकि वह जो जीवन भोग रहा था, उससे अलग जीवन कहानी में रूपायित करना उसे बेमानी और बे‌ईमानी लगा। आज कहानी में चित्रित यथार्थ का यह रूप उसे नयी कहानी से एकदम अलग ला खडा करता है ।

     परिवेश से जुड़ी रचना - प्रक्रिया – परिवेश से गंभीर रूप से जुडकर ही श्रेष्ठ साहित्य की रचना हो सकती है। आज लेखक अपने चारों ओर जो जीवन देख रहा है, उसी को अपनी रचना में जी रहा है । परिवेश की जीवन स्थितिओं से वह अपने पात्र और कथ्य को उठाता है । आज की कहानियों में अधिकांश में आर्थिक समस्याओं का चित्रण अथवा कुछ राजनीतिक संदर्भ जो पाया जाता है, उसका मूल कारण यही है कि कलाकार अपने परिवेश से जुडा हुआ है। विभिन्न कहानियों में आज के जीवन के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि पक्ष बडी खूबसूरती से चित्रित हुए हैं।

     जीवन-मूल्यों में बदलाव - आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों में बडा  भारी परिवर्तन आया है। प्रेम, विवाह, परिवार में माँ-बाप, भाई-बहन, पिता-पुत्र-पुत्री, मित्र आदि के जितने भी सुदृढ संबंध हो सकते थे, उन सबके संबंध में हमारी सोच और चिंतन प्रक्रिया में बडा भारी अंतर दिखायी देता है। संयुक्त परिवार की इकाइयाँ टूटकर छोटे-छोटे परिवार अस्तित्व में आ गये जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति आत्मकेंन्द्रित होता चला गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे मानवीय और आत्मीय रिश्ते अर्थाश्रित हो गये। इस नये परिवेश ने जो नयी मूल्य-दृष्टि विकसित की, स्थान-स्थान पर उसका परिचय समकालीन कहानी विविध रूपों में दे रही है।

     नयी नैतिक-दृष्टि - मूल्यों में परिवर्तन के साथ- साथ आज नैतिकता का परंपरागत अर्थ भी लुप्तप्राय हो गया। धर्म और ईश्वर की धारणा में भी परिवर्तन आ गया। विभिन्न दार्शनिकों द्वारा ईश्वर की सत्ता की अस्वीकृति पाप-पुण्य और उनके आधार पर दण्ड की मान्यता को बदल दिया। व्यक्ति का कोई भी कृत्य आज पाप-बोध नहीं जगाता। उसे एक जैविक प्रवृत्ति के रूप में मानने लगा। समकालीन कहानी ने इस नये नैतिकता-बोध को ग्रहण कर प्रेम, विवाह और यौन-संबंन्धों में एक बहुत खुली दृष्टि अपनायी। महिला कलाकारों ने भी बहुत अधिक बोल्ड कहानियाँ लिखकर इस नयी नैतिकता का परिचय दिया।
      स्त्री-पुरुष संबंधों में परंपरागत दृष्टि का नकार - वर्तमान युग में स्त्री-पुरुष  के पारस्परिक संबंधों में बहुत बडा परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन विवाह और विवाहेतर प्रेम-संबंधों दोनों में दिखाई देता है। नैतिकता के नये बोध ने यौन-शुचिता की धारणा को मंजित कर काम को मात्र एक दैहिक, जैविक आवश्यकता के रूप में स्वीकारा। इस दृष्टि ने प्रेम और विवाह की परंपरागत अवधारणाओं को समाप्त कर दिया। विवाह और प्रेम की सूक्ष्मातिसूक्ष्म समस्याएँ और स्थितियाँ समकालीन कहानीकारों ने चित्रित कीं। इन कहानियों में परंपरावादी दृष्टि को पूर्ण नकारकर व्यक्तित्व की स्वतंत्रता की स्थापना में सामाजिक परंपरागत नैतिक मूल्यों को छिन्न-विछिन्नकर कहानीकारों ने अपने मन की बात पूर्ण निस्संगता से कही।

जीवन के आर्थिक पक्ष की प्रधानता - बढती बेरोजगारी विशेषकर शिक्षित बेरोजगारी ने देश में नैराश्य और अवसाद को जन्म दिया। शिक्षा, योग्यता और प्रतिभा की दारुण अवमानता, भ्रष्ट व्यवस्था में भाई-भतीजावाद के प्रश्रय ने युवा-मानस के सपनों को तोड उसे घोर आर्थिक यंत्रणा में डाल दिया। सामान्य मनुष्य जिंदगी के विभिन्न मोर्चों पर अपने अस्तित्व के लिए जो भी लडाई लड रहा है, उसकी मुख्य धुरी अर्थव्यवस्था पर करारे प्रहार करना ही है। समकालीन कहानी मनुष्य की इस लडाई में सहभागी बनकर आयी है।

      तीव्र व्यवस्था-विरोधी स्वर - समकालीन कहानी ने अपने चतुर्दिक राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक सभी व्यवस्थाओं को भ्रष्ट पाया तो उसमें उनके प्रति एक तीव्र रोष प्राप्त होता है। देश में वामपंथी चिंतन और नक्सलवाद जैसे आंदोलनों ने व्यवस्था से लडते कहानीकार की वाणी को और भी तुर्शी प्रदान की। भ्रष्ट व्यवस्था पर रोष के साथ-साथ समकालीन कहानी में एक विद्रोही भाव है। कथानक भ्रष्ट व्यवथा से समझौता नहीं करते अपितु उसके प्रति तीव्र रोष व्यक्त करते हैं।
      राजनीतिक गतिविधियों से निकट संबंध - समकालीन कहानी अपने समय की रजनीतिक गतिविधियों से बेख़बर नहीं अपितु वह उससे पूरी तरह जुडी हुई है। आज लेखक राजनीति को  अपने लेखन से इसीलिए अलग करके नहीं देख सकता कि उसके जीवन यथार्थ की स्थितिओं को गढने में राजनीति का बहुत बडा हाथ है। चुनाओं की धांधलेबाजी, राजनीतिज्ञों द्वारा चुनाव में जनता का शोषण, उससे किये गये वायदे और उनका थोथापन आदि चुनाव स्थितियों पर समकालीन कहानी भरपूर प्रकाश डालती है।

     कहानी का बौद्धिक पक्ष - समकालीन कहानी जीवन यथार्थ के कटु एवं भयावह सत्यों से जूझते रहने के कारण व्यक्ति के अस्तित्व से संबंधित प्रश्नों के समाधान हेतु हमारी चेतना को झिंझोडती है। इसलिए आज कहानी एक चिंतन विधा का रूप ग्रहण कर गयी है। कहानी में आज संवेदना से अधिक प्रमुख चिंतन हो गया है। इसी कारण आज की कहानी बौद्धिक ग़ंभीरता लिए हुए है। अपने बौद्धिक चिंतन को रचना में समोने  के लिए कहानीकार ने कहानी के परंपरागत बंधे-बंधाये रूप को तोडा है। कहानी के रूपबंध में आज गद्य की लगभग समस्त विधाओं की अंतर्भुक्ति हो चुकी है। कहानी की इस बौद्धिकता ने उसे एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

     नगर  और महानगर की कथा – समकालीन कहानी में  नगर और महानगरीय जीवन को धीरे-धीरे प्रमुखता मिली है। इसका कारण यह रहा  कि पहले तो नवयुवक शिक्षा के लिए गाँव से शहर आ रहे थे फिर रोजी रोटी की तलाश में किसी नगर या महानगर में ही आकर जम गये ।इस प्रकार जो नवयुवक प्रारंभ से ही शहर में रह रहे थे, उनके अतिरिक्त जो भी शिक्षित वर्ग था वह् गाँव की जमीन से कटकर शहर से जुड रहा था या  नौकरी मिलने पर पूरी तरह वहीं से जुड गया था। इस कारण जो भी युवा कहानी-लेखन में प्रवृत्त हुआ, उसने अपने को नगर या महानगर की  विभिन्न समस्याओं से जूझते पाया। इसलिय आज नगर और महानगर के जीवन का चित्रण ही  कहानी का मुख्य स्वर बन गया। लेखनीय अभिरुचि  के साथ–सथ आज पाठकीय अभिरुचि भी नगर और महानगर को ही  कहानी में देखने की इच्छुक रही।

      नयी भाषा और समृद्ध शिल्प - समकालीन कहानीकार ने भाषा को जीवन के निकट लाकर सहज और स्वाभाविक रूप प्रदान किया। फलस्वरूप भाषा की संप्रेषण क्षमता बढ गयी। यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि राष्ट्र भाषा के रूप में समकालीन कहानी में ही हिंदी गद्य की सर्वाधिक संभावनाएँ और क्षमताएँ उद्घाटित हो रही हैं। समकालीन कहानी का शिल्प भी अत्यंत आकर्षक और समृद्ध है। व्यंग्य, फंतासी, लोककथा-शैली, पौराणिक कथाओं की वर्तमान संदर्भ में प्रस्तुति, रिपोर्ताज, रेखाचित्र, बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी आदि शैलियों के नूतन प्रयोगों ने  कहानी के प्रचलित रूपबंध को तोडा है। भाषा की नयी तराश और समृद्ध शिल्प के कारण समकालीन  हिंदी कहानी साहित्य की इतनी सशक्त विधा बन गयी है कि उसे सगौरव विश्व कथा सहित्य की तुलना में रखा जा सकता है ।

संदर्भ ग्रंथ –
हिंदी कथा साहित्य का इतिहास – डॉ. हेतु भारद्वाज ।
समकालीन कहानी : युगबोध का संदर्भ- डॉ.पुष्पपाल सिंह ।


*लालू तोमस कर्पगम विश्वविद्यालय कोयम्बत्तूर,तमिलनाडु में डॉ. के.पी.पद्मावति अम्मा के निर्देशन में पीएच.डी. उपाधि के लिए शोध्ररत हैं ।

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