Wednesday, June 19, 2013

गबन उपन्यास में अभिव्यक्त मध्य-वर्गीय यथार्थ



‘गबन’ में प्रेमचन्द ने मध्यवित्त-वर्ग के यथार्थ जीवन और मनोवृत्तियों का चित्रण किया है। प्रेमचन्द ने पहली बार ‘गबन’ में इस वर्ग की समस्याओं को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया है। इस वर्ग की वास्तविक आय कम है, पर अपनी झूठी शान रखने के लिये इस वर्ग के लोग अपनी हैसियत से बहुत अधिक खर्च करते हैं, और आय तथा व्यय के असन्तुलन को बेईमानी, रिश्वत, झूठ, हेरा-फेरी आदि उपायों से पूरा करना चाहते हैं। मुंशी दीनदयाल अपनी लड़की जालपा की शादी महाशय दयानाथ के पुत्र रमानाथ से करते हैं। दीनदयाल दिल खोल कर खर्च करते हैं, क्योंकि उनका वेतन चाहे केवल पाँच रुपये था, पर ‘ऊपर की आमदनी’ का कोई हिसाब नहीं था। दूसरी ओर, रमानाथ सुन्दर सजीला जवान है। उसके पिता महाशय दयानाथ बड़े ईमानदार आदमी हैं। उन्होंने कभी एक पैसा भी रिश्वत का नहीं लिया। वह ऐसी पाप की कमाई से घृणा करते हैं। पर लड़का नयी रोशनी का फैशनेबल युवक है। वह अभी बेकार है, पर यार दोस्तों में बैठने-उठने के कारण उसकी खाने-उड़ाने की इच्छा प्रबल हो चुकी है। वह शादी में खूब खर्च करा देता है। दयानाथ भी उसकी तथा अपनी पत्नी की बातों में आकर हैसियत से बहुत बढ़-चढ़कर खर्च कर देते हैं। सर्राफे से उधार गहने आ जाते हैं। दिखाने के लिए और भी कई तरह का खर्च खूब बढ़-बढ़कर किया जाता है। यही खर्च उनके लिए समस्या बन जाता है।

रमानाथ अपनी पत्नी जालपा से घर की स्थिति छिपा कर रखता है। वह उलटा बहुत जीट उड़ाता है— बहुत धन है, जायदाद है, बैंकों में रुपया पड़ा है। वह अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए उसकी फरमाइशें पूरा करना चाहता है। सर्राफे के तकाजे होने से उसे अपनी पत्नी के जेवर चुराने पड़ते हैं। स्वयं जेवर चुराकर बाप-बेटा उड़ाते यह हैं कि जेवर चोर चुरा ले गये। इस वर्ग के कृत्रिम जीवन की बहुत सुन्दर झाँकी प्रेमचन्द ने प्रस्तुत की है। इस उपन्यास की मुख्य समस्या नारी का आभूषण-प्रेम नहीं है, जैसा कि कुछ आलोचक कहा करते हैं। आभूषण-प्रेम तो गौण बात है। जालपा के मन में चन्द्रहार की लालसा बचपन से थी और इसमें संदेह नहीं कि उसके जेवर चले जाने पर वह निर्जीव-सी उदास रहने लगी थी और जब रमानाथ फिर सर्राफे से उसके लिये कंगन और हार उधार लाता है तभी वह प्रसन्न होती है। परन्तु इस सारी परिस्थिति के पीछे पति द्वारा वास्तविकता से दुराव है। यदि उसे मालूम हो जाता कि जेवर उधार में आये हैं और घर की वास्तविक स्थिति वह नहीं जो रमानाथ शेखी में बताया करता था, तो वह कभी जेवरों के लिए आग्रह न करती।

रमानाथ स्वयं अपने जाल में फँसता है। अपने जीवन को वह कितना आडम्बरपूर्ण और कृत्रिम बना लेता है। वह अपनी शान रखने के लिए फैशन करता है, अपनी पत्नी को फैशन में रखता है। अपनी पत्नी को अपना वेतन अधिक बताता है। रिश्वत खूब उड़ाता है। रतन के सामने अपनी झूठी शान जताता है। हेरा-फेरी से अपनी बात रखना चाहता है। रतन ने कंगन बनवाने के लिए जो रुपये दिये थे, उन्हें सर्राफे में देकर अपनी साख रखना चाहता है। रतन को झूठ बोल-बोलकर टालता जाता है। पर जब रतन की शंका बढ़ जाती है, वह कड़ा तकाजा करती है, तो वह चुंगी के रुपयों में से रतन को दे देता है और सरकारी गबन के भय से भाग जाता है।

प्रेमचन्द ने मध्यवर्ग के खोखले जीवन की सजीव झाँकी प्रकट की है। इस आडम्बरपूर्ण कृत्रिम और दिखावटी जीवन को निभाने के लिए इस वर्ग के लोगों को कितने स्वाँग रचने पड़ते हैं। किसी भी प्रकार का पाप-कर्म ये कर सकते हैं, बशर्ते कि वह छिपा रहे। चोरी, रिश्वतखोरी, झूठ, फरेब, हेरा-फेरी, गबन सब-कुछ सम्भव है। यद्यपि रमानाथ की समस्या व्यक्ति की समस्या है, पर यह समूचे मध्यवर्ग पर भी लागू होती है। प्रेमचन्द ने उपर्युक्त मुख्य समस्या के अतिरिक्त ब्रिटिश पुलिस-पद्धति के हथकण्डों का इस रचना में खूब पर्दाफाश किया है। पुलिस किस प्रकार झूठे गवाह बनाती है; निर्दोष दिनेश आदि को फँसाती है, गवाहों को प्रलोभन देकर, उनका नैतिक पतन करके अपने जाल में फँसाया जाता है। रिश्वत का बाजार गरम है। सत्याग्रहियों और देशभक्तों को कुचला जाता है। देवीदीन खटीक के जवान बेटे स्वदेशी आन्दोलन में पुलिस की लाठियों का शिकार हुए थे। प्रेमचन्दजी ने इस रचना में भी अनमेल विवाह का एक करुण परिणाम प्रस्तुत किया है। नवयुवती रतन एक सम्पन्न बूढ़े वकील की पत्नी है। यद्यपि वह धनी पति से सन्तुष्ट है, और उसकी अतृप्त लालसा खाने-खर्चने से दबी रहती है, पर प्रेमचन्द ने दो रूपों में उसकी करुण स्थिति में रंग भरा है। पहली स्थिति है उसके अभावग्रस्त मातृत्व का चीत्कार। दूसरी है वृद्ध और रोगी पति की शीघ्र मृत्यु और उसका परिणाम।

यहाँ प्रेमचन्द ने हिन्दू विधवा रतन की असहाय दशा दर्शाकर समाज को विचारने के लिए बाध्य कर दिया है। पति की मृत्यु के बाद उसके अधिकार छिन जाते हैं। उसका भतीजा ही छल-कपट से सारी सम्पत्ति हड़प कर जाता है और वह एकदम कंगाल हो जाती है। यह इस बेमेल वैवाहिक पद्धति का दुष्परिणाम एवं हमारे समाज में नारी की दयनीय दशा का करुणापूर्ण चित्र है।

‘गबन’ में भी प्रेमचन्द ने पूर्णतया यथार्थ से आरम्भ करके आदर्श में परिणति की है। अन्त तक पहुँचते-पहुँचते सब पात्र आदर्शवादी बन जाते हैं। रमानाथ अपनी पत्नी जालपा के प्रभाव से बदल जाता है। वह अपना बयान बदल देता है और निर्दोष अभियुक्तों को छुड़ा लेता है। वह पुलिस के प्रलोभन को ठुकरा देता है। यहाँ तक कि जोहरा वेश्या भी बदल जाती है। वह अपनी वेश्यावृत्ति छोड़कर सेवा और त्याग का जीवन बिताने लगती है। प्रेमचन्द ने रतन, जोहरा, रमानाथ, जालपा, देवीदीन आदि सब पात्रों को अन्त में सेवा और त्याग का आदर्श जीवन बिताते दिखाया है। ये सब अपना एक आदर्श संसार बसाते हैं, जहाँ छल कपट, असत्य, अन्याय आदि के स्थान पर सेवा, सत्य, अहिंसा और प्रेम का राज्य है। किन्तु ‘गबन’में यह आदर्श परिणति किसी प्रकार की अस्वाभाविकता या असंगति प्रतीत नहीं होती। वास्तव में प्रेमचन्द ही नगर के प्रपंचात्मक जीवन से ऊब कर अपने प्रिय ग्राम-जीवन के सरल, शांतिपूर्ण वातावरण में आते प्रतीत होते हैं।


*सुश्री जी. अखिलांडेश्वरी कर्पगम विश्वविद्यालय, कोयंबत्तूर में डॉ. पद्मावती अम्माल के निर्देशन में पीएच.डी. उपाधि के लिए शोधरत हैं ।

1 comment:

samuel badhe said...

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