Sunday, March 1, 2009

कविता

मकड़ी के जाले

- सुधीर सक्सेना 'सुधि', जयपुर ।


इस कमरे की
खिड़कियाँ खोल दो ।

न जाने कब-से
खिड़की खुलने को
मचल रही है ।

कमरे में जो
उदासी छाई है,
उसे तुम अपनी
मीठी मुस्कान से
भर दो ।

मकड़ी के जाले
साफ़ करने से पहले
ज़रा गौर-से
उनकी बुनावट देख लो ।
क्योंकि बिलकुल
ऐसे ही
खूबसूरत भविष्य को
गढ़ना है तुम्हें ।

1 comment:

Shubhashree said...

मकड़ी के जाले
साफ़ करने से पहले
ज़रा गौर-से
उनकी बुनावट देख लो ।
क्योंकि बिलकुल
ऐसे ही
खूबसूरत भविष्य को
गढ़ना है
तुम्हें ।

इस सुंदर अभिव्यक्ति को मैं कभी भूल नहीं सकती, मेरी बधाइयाँ ।