Wednesday, September 25, 2013
‘बाप न मारे मेढकी, बेटा तीरंदाज’
Monday, July 13, 2009
व्यंग्य

सड़क पर तिल धरने भर की जगह न थी। जब से वाहनों की खरीद किश्तों पर होने लगी या फिर आदमी में कर्जदार कहलाने की महत्वाकांक्षा पनपी, तब से दोपहिया और चौपहिए वाहनों की संख्या में मजीद इजाफा हुआ। फटफटियों, स्कूटरों और रंगरंगीली कारों और सायकिलसवारों समेत ग्यारह नंबरी सवारियों, ठेलों और रिक्षों के कारण सड़कों पर करोड़ों किलों की पसेरी का वजन हो जाता है। जो जहां है, वहीं से खिसक रहा है। चाहे या न चाहे, खिसकेगा तब भी। एक महाशय सरकार को कोस रहे थे कि अंधी है वह और बहरी भी। रैलियों से आम जनता को कितनी किल्लत होती है। दूसरा जिससे वो महाशय इरशाद लेना चाह रहे थे, तटस्थ भाव से मुंह घुमा लिया जैसे कह रहा हो, अपन की आदत में ये सब चलता है। दरअसल एक राजनैतिक पार्टी का बाजार बंदी की रैली रेंग रही थी।
आये दिन बंद, रैली, धरना, प्रदर्शन जैसे आयोजनों से सभी देश के प्रति अनिष्क्रिय लोगों को जूझना पड़ता है। ऐसे ही आम जनता की दिक्कतों को एक प्रदेश के मुख्यमंत्री, सुविधा के लिए प्रदेश का नाम कुतर प्रदेश और उसके मुखिया का नाम कठोर सिंह रख लेते हैं, से कल्पना में बतियाने का मौका मिल गया । जो बात हुई उसे मिश्राम्बु बनाये बिना पेश कर रहा हूं।
मान्यवर, आपको नहीं लगता है कि विपक्षी दलों द्वारा रैलियां, धरने और प्रदर्शन करने से आम जनता को काफी भुगतना पड़ता है।
देखिए, आम जनता में मैं भी आता हूं। मुझसे ज्यादा कौन उसका दर्द जान सकता है। दरअसल ये एक प्रकार का ध्यानाकर्षण ही है। गांधीजी होते तो इसे सत्याग्रह की संज्ञा देते।
आपके विचार में इससे जनता का नुकसान नहीं हो रहा ?
यह किसने कहा ? जनता इसे इंजाय कर रही है। कल हम विपक्ष में जायेंगे तो हम भी वही करेंगे जो विपक्षी दल अब कर रहे हैं। करनी और कथनी एक सी ही तो होनी चाहिये। एक बात और भाई, रैलियां थके हारे व्यक्ति का मनोरंजन करती है, उन्हें दिल खोल कर हंसने का मौका भी देती है।
जनता चाहती है विकास। क्या इससे उसकी ठगी नहीं हो रही ?
देखो भई विकास तो हो ही रहा है। इन गतिविधियों से हमारी जनता का मनोरंजन और टाईम पास होता है।
और बंद ?
हां बंद से निरंतर काम के बाद दुकान की शटर गिरा कर व्यक्ति को आराम मिलता है। आराम से तो आप जानते ही है कितने कष्ट मिटते हैं। दुकान के कर्मचारी अपने बच्चों को साथ लेकर चौराहों पर चाट चाटते हैं, जू में भालू, बंदर, लकड़बग्घे और भेड़िये देखते हैं। इस दिन कितने ही लाले घर पर रहते हैं। इससे घरवालियों की खुशी का हर काम कर सकते हैं।
देखिये आबादी तो बढ़ी ही है। ऊपर से आये दिन रैलियों से सड़कों पर चलना मुश्किल हो गया है। कोई वक्त से अस्पताल नहीं पहुंच पाता तो कोई बेरोजगार इंटरव्यू में नहीं जा पाता है, समय से लोग अपने काम पर नहीं पहुंच पाते। क्या आप अब भी नहीं मानते हैं कि इससे दिक्कतें बेतहाशा बढ़ी हैं ?
नो दृ आप गैरजरूरी दबाव बना रहे हैं। मैं कैसे मान लूं। आबादी बढ़ाने में सरकार का क्या रोल। आप चाहते हैं कि सरकार औरत आदमी को हमबिस्तर होने से रोकने का कानून बनाये, क्यों करे ऐसा भाई ? कितनी ही कारगिलें होंगी, तो कौन लड़ेगा उस वक्त ? रैलियां और बंद प्रदेश के विकास में कहीं किसी कोने से बाधक नहीं है। जन्म-मृत्यु के समीकरण को आप क्या नहीं जानते हैं। भगवान कृष्ण ने कितनी बार ये कहा है कि समय जिसका आ धमका, उसे तो जाना ही पड़ेगा। अब आप खामखाँ हमारे पर आप सत्याग्रही दोष मढ़ रहे हैं। ये न होते तो भी मरने वाले को मरना ही है। अमरौती का पाउच लेकर तो आता नहीं है कोई ! यह भी अब सुन लीजिए इस समय मैं बहुमत में नहीं हूं। मेरी सरकार बहुमत में आयेगी तो विधेयक लायेंगे कि प्रत्येक पार्टी एक साल में कितने बंद और कितनी रैलियां करेगी। अ ... ह ... हा .. हा .... बाकायदा शासनादेश लायेंगे।
मैंने कहा - सर, एक समय ऐसा भी आ सकता है कि रैलियों के लिए मुद्दें ही न हो।
हो ही नहीं सकता। जब हम राजनीति में आते हैं तो मुद्दों के साथ आते हैं और ज्यादा से ज्यादा गढ़े जा सकें, इसके लिए चैन नहीं लेते। अपने प्रथम प्रधानमंत्री जी ने ठीक ही कहा था न .... कि आराम हराम है। बुद्धिजीवी भी थे न ... वे।
मैंने कहा - बुद्धिजीवी ?
हां आज बुद्धिजीवी स्वयं में एक मुद्दा है। वह बुद्धि की खाता है और दिल से फटीचर रहता है। उसके पैरों में कोई शनीचर न रहे इसलिए हम पहले से ही थोक के भाव में उसके मुद्दे उगा लेते हैं।
तो आप मानते हैं कि बंद और रैलियों से आम जनता को कोई तकलीफ .....
बात काटते हुए बोले वह - ये कहां हम कह रहे हैं। कि तकलीफ नहीं होती है, वो भी आप जैसों को। और आप आम जनता नहीं हैं। आम जनता तो रैलियों में आती है, भूलभुलैया और इमामबाड़ा देखती है, चकाचक राजधानी को देखकर विकास कार्यों का जायजा लेती है।
तो रैलियों में आने वाली ही आम जनता होती है ?
आम जनता, बड़ा अच्छा सवाल किया है तुमने। बहुत खूब। दरअसल आम जनता थके-हारे सर्वहारा लोगों का पर्याय है जो क्रांति से पूर्व शांतिपूर्वक प्रदर्शन में विश्वास रखते हैं। लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाला ही आम आदमी होता है। इसलिए आम आदमी वाणी की स्वतंत्रता और विरोध का अधिकार रखती है। अब समझे, आप ।
कहते हैं कि आम जनता को ढोने के लिए बसों का प्रबंध भी आपने किया है ?
कौन कहता है, समझ गया, ये सब विरोधियों का मिथ्या प्रचार है। पार्टी फंड आम जनता ही बनाती है और पार्टी फंड से इन्हें इनके संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए यहां लाया जाता है, तो इसमें बुराई क्या ?
कोई बुराई नहीं है, यदि पार्टी उनकी है तो फंड भी उनके कल्याण के लिए ही होता है। पर अभी एक सवाल अनुत्तारित है, वह यह कि आम आदमी आपकी नजरों में क्या है ?
आम आदमी, ओफ्फो भैये, जिसे भूलने और माफ करने की लाईलाज बीमारी हो। यह उनकी झुंझलाहट थी।
तुरंत ही महसूस किया मैंने कि आगे और सवाल करने में ये मुझे कागभुसुंडी बना देगा। अब इसके पेट का कारखाना भी खुराक लेने की फिराक में लगता है। तो वेलकम वाला जूटिया पांवपोंछ प्रसाधन बदशक्ल करता हुआ फुटपाथ पर आ खड़ा हुआ। देखता रहा कि सिर्फ तैंतीस परसेंट पाने के लालच में अंगप्रत्यंग का भरपूर इस्तेमाल करती ये रंगबिरंगी रैलिया-महिलायें भविष्य के प्रति कितनी चिंतित थीं।
सूर्य सदन, सी-501/सी, इंदिरा नगर
लखनऊ 226016
मोबा. 9450003746
Wednesday, July 1, 2009
व्यंग्य

- आर.के. भँवर
वह जो मर गया है आदमी ही था । सुबह का वक़्त । लोग टहलने के लिए निकले थे । उसकी लाश सड़क के किनारे पड़ी थी । कौन था ? कैसे मरा वह ? ये कई सवाल ऐसे थे जो कुछेक लोगों के जेहन में उभर रहे थे । पर मरने वाला एक आदमी था, कपड़े लत्ते से लग रहा था कि वह ऊंची जमात का नहीं था । खून से उसकी काया लथपथ भी नहीं थी, वह सड़क के किनारे इस तरह पड़ी थी मानो गहरी नींद में सो रहा हो कोई । कुछ लोग उसे घेरे हुए थे । घेरा बनाने वाले दूर-दूर तक मार्निंग वॉक से मतलब नहीं रखते थे । वे सब आचरज से देख रहे थे । हलांकि वे उसके रिश्तेदार नहीं थे।
मार्निंग वॉक वाले लोग सिर्फ वाकिंग पर थे । कुछ एक ऐसे भी थे जो कुछ-कुछ समाजशास्त्र के जानकार थे । जौगिंग करते करते एक ने दूसरे से कहा कि होगा यह कि रात ज्यादा पी ली होगी या फिर कहीं लड़ा-झगड़ा होगा । मजबूत पार्टी वाले ने ढेर कर दिया होगा । “पर खून तो बहा नहीं, नही नही ऐसा नही हुआ होगा ?” उल्टे प्रश्न को सीधा करते हुए दूसरे ने कहा । तभी हल्की दौड़ में शामिल एक दूसरे ने पूछा कि अब मौत आ गई तो आ गई । वो किसी से पूछ कर तो आती नहीं । अब जैसे शर्मा जी को ही ले लें, मार्निंग वॉक के लिए तैयार हुए ही थे कि दिल जबर्दस्त दौड़ पड़ा, नहीं उठ पाये फिर ।
निकलने वालों के लिए मरे आदमी की लाश चर्चा में तो थी, पर सभ्य और कुलीन लोग उस जगह रूक कर अपना समय खराब नहीं करना चाहते थे । समाज की सभ्यता शिखर पर थी । कोई अपना समय मरे आदमी के वास्ते क्यों खराब करे ? जिसको जाना था वह चला गया । किसी को पहले से बताकर पैदा भी नहीं हुआ था वह । फिर उन्हें तो रहना है । गणित भी यही कहती है और समाज का अर्थशास्त्र भी । अब कोई मरनेवाले के साथ तो मर नहीं जाता है । और मरे व्यक्ति बहुत दिनों तक जेहन में रहते भी नहीं हैं । पुराने पत्तो पेड़ से अपना स्थान इसलिए खारिज कर देते हैं कि नये पत्ते निकल आए । मिट्टी में मिलने पर वही पत्ते खाद बन जाएंगे । पत्तों और आदमियों के फलसफे में यहीं तो होता है बुनियादी अंतर ।
अब जिसे मरना था, वह तो मर गया । समझदारी इसी में थी कि समाज का काम अनवरत चलता रहे । चलता तो रहता है, पर यह सब वैसे ही है जैसे फिल्म शुरू होने से पहले न्यूज रील के चलने जैसा हो । इधर आदमी भी बड़े बेभाव मर रहे हैं । कुंडी खटखटायी, बुढ़िया ने जैसे दरवाजा खोला कि छुरा उसके पेट में और कुंडी खटखटाने वाला घर के अंदर। अखबारों में तो रोजबरोज ऐसी ही सूचनाएं पढ़ने को मिलती हैं । गाड़ी चला रहे थे, सामने वाले को बचाने में लगे कि खुद पलट गए । अस्पताल में ब्रेन हैमरेज फिर सीधे ऊपर । पहले बाल्टी मेरी भरेगी, नहीं पहले मेरी, मेरी, मेरी कहते कहते गुम्माबाजी हो गई, एक दर्जन घायल और कुछेक ने दम तोड़ दिया । पहले जैसे बच्चा-बच्ची गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलते थे अब बड़े लोग 'इसे मारो-उसे मारो' का खेल रहे हैं। सुपाड़ी दो, पूरी न मिले तो सुपाड़ी की कतरन दो, काम दोनों में ही चलना है । आदमी का मारा जाना अथवा उसे मारना आज की दुनिया का अहम् व्यवसाय है । बाहुबली से कभी श्री हनुमान जी का बोध होता था, अब इससे दाउद भाई, छोटा, बड़ा, मंझला शकील, पप्पू यादव, बबलू भैया, आदि-आदि का । संकटमोचन हैं, इसलिए उनके नाम के स्मरण मात्र से धंधे की कोई भी वैतरणी पार लग जाएगी । हाथी, पंजा, कमल, साईकिल, लालटेन, ताला-चाभी सभी तो इनके दम पर चलते और लगते हैं । कहीं कम तो कहीं ज्यादा ।
सबसे सस्ती है आदमी की जान । इसे जब चाहें, जहां चाहें, कोई वॉट लगा सकता है । घर से निकले कि बाहर घमाघम, ढेर हो गए । मरते ही, वह मान्यताओं की खाल ओढ़े समाज की चिंता का विषय बन जाता है । कुछ समय के लिए वह मानवाधिकार चिंतकों का मुद्दा भी है और अखबारों की सनसनी भी । पर एक आदमी की मौत से कोई हिलता क्यों नहीं, क्या उसकी मौत में जिंदा आदमी अपनी सूरत नहीं देख पा रहा है । सांस-सांस मर रहे आदमी और अचानक मर गए आदमी में चिंता स्वाभाविक है । उस मरे आदमी को घेरे हुए उन लोगों के पास कोई काम-धाम नहीं है । सड़क पर इधर-उधर घूमना ही था उन्हें, अब क्या करें इधर-उघर जाकर, इस मरे आदमी के पास ही खड़े हो जाते हैं, समय ही कटेगा कुछ । खड़े लोगों से उसके मरने का कोई ताल्लुक नहीं है । वे तमाशबीन हैं । डुग्गी बजाते मदारी के पास भी वे लोग वैसे ही खड़े जाते हैं । जो नहीं खड़े थे, उनकी भी आत्मा उधर ही भटक रही थी, पर खड़े इस वास्ते नहीं हो सकते थे क्योंकि वे या तो अपने वाहन से उतर कर आम आदमी की कोटि में आने से अपनी बेइज्जती समझते थे या अंग्रेजी पहचान देने वाली पोशाक पहने थे । स्टेटस तो देखना ही पड़ता है । अब यह आदमी होटल ताज के अंदर गिरा, पड़ा व मरा मिलता तो वे सूट-बूट वाले साहेब का वहां पर खड़े होकर हमदर्दी दिखना मुनासिब था । सड़क है । सड़क की भाषा और व्याकरण चलताऊ किस्म का होता है । सड़क पर चलते लोग भीड़ के किस्म में होते हैं । भीड़ नारा लगा सकती है, उत्पात मचा सकती है, झंडा उठा सकती है । भीड़ संवेदना का वरण नहीं कर पाती है । मरने वाले आदमी का घेरा भीड़ जब बढ़ा लेती है, तो आंदोलन के समीकरण बनाने बिगाड़ने वाले चतुर सुजान भी जुट जाते हैं । यह भी ज्यादा देर तक नहीं चलता है । भीड़ की भाषा संवेदना के सुर से अलग है। संवेदना अकेले आदमी की थाती है । दिल की बात दिल तक जाती है।
एक आदमी की मौत न्यूज की लाईन के बन जाने के बाद भी आम आदमी के जेहन में अपनी पैठ नहीं बना पा रही है । पर रोज सड़क पर कुत्ता टहलाने वाले बाबू मोशाय का कुत्ता जब किसी गाड़ी के नीचे आकर जीभ लंबी कर देता है, तो बाबू मोशाय से मरे कुत्ते के प्रति शोक जताने वाले कई कई लोग जुट जाते हैं । इसीलिए आदमी रोज बरोज मर रहे हैं । दोपहिए, चौपहिए, मालगाड़ी, हथगोले, बंदूक न जाने कितने-कितने निमित्ता उसे मरने, मारने व मिटाने में लगे हुए हैं । आतंक के साये में जी रहे अंचलों में आदमी रात भर जगते हैं, केवल सुबह थोड़ी देर तक सो लेते हैं । एक आदमी की मौत यदि हमारा सरदर्द नहीं बनती है तो समझ लेना चाहिए कि कहीं कोई बीमारी जन्म ले रही है । समय से उसका उपचार जरूरी है क्योंकि संवेदनहीनता का रोग ऐसा मठ्ठा है जो इन्सानियत के दरख्त की जड़ों में जाने से समूचे पेड़ को ठूंठ में तब्दील कर देगा । हुआ भी यही, जब उस मरे आदमी की तफ्तीश के वास्ते देर दोपहर में पुलिस आई और पंचनामा के लिए पांच आदमियों से दस्तखत करने के लिए कहा, तो सबके सब भाग खड़े हुए । किसी ने कुछ देखा ही नहीं, कब हुआ कुछ पता ही नहीं । इधर से बस गुजर रहे थे, इस मरे को देखा तक नहीं । कौन है, पता नहीं । कैसे मरा, राम जाने । अब मरने वाले के साथ कोई मर नहीं जाता है, यह समाज की बारीक सोच थी । पुलिस ने कहा तो यहां खड़े क्यों थे ? जवाब मिला, यहां कहां, अरे हम तो बस का इंतजार कर रहे थे, ये तो बाद में पता चला कि मेरे पीछे एक मरे आदमी की लाश पड़ी है । और आप ? पुलिस ने दूसरे से पूछा । मै, वो इनसे घड़ी का टैम पूछने के लिए रूक गया था ।
सिपाही जी दरोगा जी से बोले – “साहेब यह पांच दस्तखत तैयार, हो गया पंचनामा ।”
“इस तरह आदमी तो रोज मरा करते हैं, फालतू टैम है का” - दरोगा ने डांट पिलाई । “चलो कुछ धंधेवाला काम भी करना है ।”
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