Saturday, August 1, 2026

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि -- दादा कैलाशचंद्र पंत : हिंदी की संस्थागत चेतना के महायात्री

दादा कैलाशचंद्र पंत : हिंदी की संस्थागत चेतना के महायात्री

संस्मरण, व्यक्तित्व और कृतित्व

चार दशकों की आत्मीय स्मृतियों में एक अनन्य हिंदी साधक

- डॉ. सी. जय शंकर बाबु

 


भूमिका

हिंदी भवन का वह कमरा आज भी याद है…

भोपाल के हिंदी भवन का वह कमरा आज भी स्मृतियों में उसी आत्मीयता के साथ जीवित है। चारों ओर पुस्तकों से भरी अलमारियाँ, मेज़ पर सुव्यवस्थित ढंग से रखी नवीन प्रकाशित पुस्तकें, 'अक्षरा' और अन्य पत्र-पत्रिकाओं के ताज़ा अंक, आने-जाने वाले साहित्यकारों की निरंतर आवाजाही, और उस सबके बीच अपनी सहज, प्रसन्न और आत्मीय मुस्कान के साथ बैठे दादा कैलाशचंद्र पंत। उनके कक्ष में प्रवेश करते ही यह अनुभव नहीं होता था कि हम किसी बड़े प्रशासक, प्रतिष्ठित संपादक  मिलने आए हैं; ऐसा लगता था मानो किसी आत्मीय अभिभावक के घर पहुँचे हों, जहाँ औपचारिकताओं से अधिक संवाद का महत्त्व है।

हमारी चर्चाओं का कोई निश्चित विषय नहीं होता था। कभी दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार की नई संभावनाएँ चर्चा का विषय बनतीं, कभी 'जनधर्म' और 'अक्षरा' की संपादकीय योजनाएँ, कभी विश्व हिंदी सम्मेलनों की उपलब्धियाँ, तो कभी 'युग मानस' की आगामी योजना। साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, संस्कृति, भारतीय भाषाएँ, संगठन, नई पीढ़ी और राष्ट्र—इन सबके बीच दादा पंत सहजता से विचरण करते थे। वे केवल बोलते नहीं थे; सुनते भी थे। वे केवल मार्गदर्शन नहीं करते थे; सामने वाले के विचारों का सम्मान भी करते थे। यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी।

31 जुलाई 2026 को जब उनके निधन का समाचार मिला, तो सबसे पहले यही कमरा स्मृतियों में उभर आया। लगा, जैसे हिंदी भवन की आत्मा का एक दीपक शांत हो गया हो। कुछ क्षणों के लिए विश्वास ही नहीं हुआ कि जिनसे कुछ दिन पहले तक राष्ट्रीय प्रश्नों पर संवाद हो रहा था, जो नब्बे वर्ष की आयु में भी उसी ऊर्जा से लिख रहे थे, सोच रहे थे, योजनाएँ बना रहे थे, वे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके जाने से केवल एक व्यक्ति का अभाव नहीं हुआ; हिंदी-जगत ने एक ऐसी संस्था को खो दिया, जिसने अपने जीवन को स्वयं से अधिक भाषा, साहित्य और समाज के लिए समर्पित कर दिया था।

मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि लगभग चार दशकों तक मुझे उनके निकट रहने, उनसे सीखने, उनका स्नेह प्राप्त करने और समय-समय पर उनके साथ हिंदी की विविध योजनाओं में सहभागी बनने का अवसर मिला। यह लेख उसी आत्मीय संबंध की स्मृतियों से उपजा है। यह न तो औपचारिक श्रद्धांजलि है और न ही केवल जीवन-वृत्त का पुनर्पाठ। यह उस पीढ़ी के एक प्रतिनिधि पुरुष का स्मरण है जिसने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि भाषा की सेवा केवल लेखन से नहीं होती; उसके लिए संस्थाएँ बनानी पड़ती हैं, लोगों को जोड़ना पड़ता है, नई प्रतिभाओं को अवसर देना पड़ता है और स्वयं को निरंतर पीछे रखकर कार्य को आगे बढ़ाना पड़ता है।

आज जब संचार के साधन अत्यंत विकसित हैं, तब भी आत्मीय संवाद का संकट दिखाई देता है। दादा कैलाशचंद्र पंत उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिनके लिए संबंध पत्रों से बनते थे, विश्वास से विकसित होते थे और आजीवन निभाए जाते थे। उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि लेखक किस प्रदेश का है; उन्होंने यह देखा कि उसका प्रयत्न कितना ईमानदार है। यही कारण था कि दक्षिण भारत के एक अपेक्षाकृत छोटे नगर गुंतकल में हिंदी प्रचार, पत्रकारिता और साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न एक युवा कार्यकर्ता के प्रयासों को उन्होंने उसी आत्मीयता से अपनाया, जिस आत्मीयता से वे देश के वरिष्ठतम साहित्यकारों का सम्मान करते थे। यही उनका बड़प्पन था; यही कारण है कि पूरा हिंदी समाज उन्हें आदर से "दादा" कहकर पुकारता था।

एक युग का अवसान

31 जुलाई 2026 को अनन्य हिंदी-सेवी, वरिष्ठ पत्रकार, प्रख्यात संपादक, सांस्कृतिक संगठक, हिंदी भवन भोपाल के प्राणपुरुष तथा पद्मश्री से सम्मानित दादा कैलाशचंद्र पंत की जीवनयात्रा पूर्ण हुई। लगभग नौ दशकों का उनका जीवन भारतीय भाषा-जगत की उस साधना का इतिहास है जिसमें व्यक्ति की सफलता से अधिक समाज की उन्नति और भाषा का विकास महत्त्वपूर्ण होता है।

उनके निधन का समाचार केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहा। हिंदी के विविध क्षेत्रों—साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्रभाषा आंदोलन, विश्व हिंदी सम्मेलन, हिंदी प्रचार संस्थाएँ, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और देश-विदेश के हिंदी प्रेमियों—सभी ने इसे अपनी व्यक्तिगत क्षति के रूप में अनुभव किया। इसका कारण केवल उनका दीर्घ सार्वजनिक जीवन नहीं था; उसका कारण था उनका आत्मीय व्यक्तित्व। उन्होंने जहाँ भी कार्य किया, वहाँ लोगों को जोड़ा; जहाँ भी संस्था बनाई, वहाँ संवाद की परंपरा स्थापित की; और जहाँ भी पहुँचे, वहाँ हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता का माध्यम माना।

उनके जीवन को केवल पुरस्कारों और पदों की सूची से नहीं समझा जा सकता। पत्रकार के रूप में उन्होंने निर्भीक लेखन की परंपरा विकसित की; संपादक के रूप में नई प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच दिया; संगठनकर्ता के रूप में हिंदी भवन और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जैसी संस्थाओं को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया; और हिंदी-सेवी के रूप में देश के उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के बीच आत्मीय सेतु का निर्माण किया। उनके लिए हिंदी का अर्थ किसी एक क्षेत्र की भाषा नहीं था; वह भारत की साझा सांस्कृतिक चेतना की वाहक थी।

यही कारण है कि दादा पंत का निधन केवल एक सम्मानित साहित्यकार की मृत्यु नहीं है; यह उस पीढ़ी के एक प्रतिनिधि पुरुष का अवसान है जिसने स्वतंत्र भारत में हिंदी की संस्थागत संरचना को आकार देने में अपना संपूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। ऐसे व्यक्तित्व समय-समय पर जन्म लेते हैं। वे स्वयं इतिहास नहीं लिखते; वे ऐसी संस्थाएँ, ऐसे संबंध और ऐसे संस्कार निर्मित करते हैं जिनसे आने वाली पीढ़ियाँ अपना इतिहास लिखती हैं।

संघर्ष से साधना तक :  पत्रकारिता से संस्थान-निर्माण की अद्भुत यात्रा

दादा कैलाशचंद्र पंत का जीवन इस सत्य का साक्षात् प्रमाण है कि महान व्यक्तित्व केवल जन्मजात प्रतिभा से नहीं बनते; वे अपने सतत् कर्म, अनुशासन, दूरदृष्टि और समाज के प्रति समर्पण से निर्मित होते हैं। उनका जीवन-वृत्त पढ़ते समय सहज ही यह अनुभव होता है कि उन्होंने प्रत्येक पड़ाव को किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि हिंदी समाज की सामूहिक यात्रा के एक चरण के रूप में स्वीकार किया।

मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक भूमि पर जन्मे कैलाशचंद्र पंत ने युवावस्था से ही पत्रकारिता को अपने सार्वजनिक जीवन का माध्यम बनाया। उस समय पत्रकारिता केवल समाचार-संकलन का कार्य नहीं थी; वह राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का एक सशक्त उपकरण मानी जाती थी। स्वतंत्र भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को नए रूप में गढ़ रहा था, और भारतीय भाषाओं की भूमिका पर व्यापक विमर्श चल रहा था। ऐसे समय में पत्रकारिता का दायित्व केवल घटनाओं का विवरण देना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी था। दादा पंत ने इसी पत्रकारिता को अपनी कर्मभूमि बनाया।

उन्होंने जीवन नवप्रभात, नवभारत और इंदौर समाचार जैसे प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में कार्य करते हुए समाचार-लेखन, संपादन और वैचारिक पत्रकारिता के विविध आयामों को निकट से समझा। इस काल ने उन्हें दो महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ दीं—पहली, शब्द की शक्ति; और दूसरी, संस्था की आवश्यकता। उन्होंने अनुभव किया कि अकेला लेखक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, किंतु एक सशक्त संस्था पीढ़ियों का निर्माण करती है। यही विचार आगे चलकर उनके समूचे जीवन-दर्शन का आधार बना।

'जनधर्म' : संपादक नहीं, लोकधर्म के साधक

सन् 1977 में जब उन्होंने मध्यप्रदेश के चर्चित साप्ताहिक जनधर्म का संपादन संभाला, तब हिंदी पत्रकारिता वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रही थी। समाज बदल रहा था, राजनीति नए मोड़ ले रही थी, और पत्रकारिता पर भी अनेक प्रकार के दबाव थे। ऐसे समय में जनधर्म केवल एक समाचारपत्र नहीं रहा; वह विचार, संस्कृति और जनचेतना का मंच बन गया।

दादा पंत के संपादकीयों में निर्भीकता थी, किंतु कटुता नहीं; स्पष्टता थी, किंतु पूर्वाग्रह नहीं; राष्ट्रीय दृष्टि थी, किंतु संकीर्णता नहीं। यही कारण था कि उनके अग्रलेखों की प्रतीक्षा पाठक उत्सुकता से करते थे। 'दिव्यचक्षु' उपनाम से लिखे गए उनके व्यंग्य भी सामाजिक विसंगतियों पर तीक्ष्ण प्रहार करते थे, किंतु उनमें व्यक्तिगत आक्षेप का स्थान नहीं होता था।

पत्रकारिता उनके लिए व्यवसाय नहीं, लोकधर्म थी। शायद इसी कारण उन्होंने अपने समाचारपत्र का नाम भी जनधर्म रखा—मानो पत्रकारिता का सर्वोच्च धर्म जनता के प्रति उत्तरदायित्व ही हो।

मेरे अपने जीवन में भी जनधर्म का विशेष स्थान रहा। दक्षिण भारत से भेजे गए मेरे समाचार, लेख और टिप्पणियाँ दादा पंत ने न केवल प्रकाशित कीं, बल्कि उन्हें वह महत्त्व भी दिया, जो किसी नवोदित पत्रकार के आत्मविश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि लेखक देश के किस भाग से लिख रहा है; उन्होंने केवल यह देखा कि उसमें हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता कितनी है। संपादकीय निष्पक्षता और प्रतिभा के प्रति सम्मान का यह गुण आज भी उनके व्यक्तित्व की सबसे उज्ज्वल पहचान है।

'अक्षरा' : साहित्यिक पत्रकारिता का मानदंड

यदि जनधर्म ने उनकी पत्रकारिता को राष्ट्रीय पहचान दी, तो अक्षरा ने उन्हें हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता के श्रेष्ठ संपादकों की पंक्ति में स्थापित किया।

सन् 1982 में प्रारंभ हुई अक्षरा केवल एक साहित्यिक पत्रिका नहीं थी; वह भारतीय साहित्यिक विमर्श का जीवंत मंच थी। उसमें प्रकाशित सामग्री को देखकर सहज ही स्पष्ट हो जाता था कि उसके पीछे किसी ऐसे संपादक की दृष्टि कार्य कर रही है जो साहित्य को केवल रचना तक सीमित नहीं मानता, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन से जोड़कर देखता है।

दादा पंत की संपादकीय नीति अत्यंत स्पष्ट थी। वे प्रसिद्धि से अधिक गुणवत्ता को महत्त्व देते थे। नए लेखकों को अवसर देना, विविध विचारधाराओं के बीच स्वस्थ संवाद बनाए रखना, भारतीय भाषाओं और हिंदी के पारस्परिक संबंधों को प्रोत्साहित करना तथा साहित्यिक गरिमा को बनाए रखना—ये अक्षरा की पहचान बन गए।

मेरे लिए भी अक्षरा का प्रत्येक अंक किसी पत्रिका से अधिक एक पाठशाला था। दादा पंत नियमित रूप से उसके अंक भेजते थे। प्रत्येक अंक यह सिखाता था कि एक साहित्यिक पत्रिका केवल रचनाओं का संकलन नहीं होती; वह अपने समय की सांस्कृतिक चेतना का दर्पण होती है।

हिंदी भवन : एक भवन नहीं, हिंदी का जीवंत विश्वविद्यालय

दादा कैलाशचंद्र पंत के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि किसी एक संस्था में साकार हुई, तो वह है हिंदी भवन, भोपाल।

सन् 1988 में जब उन्होंने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन न्यास तथा पंडित मोतीलाल नेहरू स्मृति पुस्तकालय के संचालन का दायित्व संभाला, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाले वर्षों में हिंदी भवन राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बन जाएगा।

उन्होंने भवन का केवल प्रशासन नहीं किया; उन्होंने उसे जीवंत बनाया। देशभर के साहित्यकारों, पत्रकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए हिंदी भवन एक ऐसा मंच बना जहाँ विचारों का मुक्त आदान-प्रदान संभव था। व्याख्यानमालाएँ, राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ, पुस्तक विमोचन, साहित्यिक गोष्ठियाँ, युवा लेखक सम्मेलन, शोधपरक चर्चाएँ—इन सबके माध्यम से उन्होंने हिंदी भवन को एक निरंतर सक्रिय सांस्कृतिक परिसर में परिवर्तित कर दिया।

किसी भी संस्था का वास्तविक विकास केवल भवनों से नहीं होता; वह उसके वातावरण से होता है। हिंदी भवन में प्रवेश करते ही यह अनुभव होता था कि वहाँ साहित्य केवल पुस्तकालय की अलमारियों में नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार, संवाद और आत्मीयता में भी जीवित है। इस वातावरण का निर्माण दादा पंत की कार्यशैली ने किया था।

उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि संस्था का निर्माण धन से नहीं, विश्वास से होता है; भवन ईंटों से बनते हैं, किंतु संस्थाएँ मनुष्यों से बनती हैं।

वे केवल व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे

कुछ लोग उत्कृष्ट लेखक होते हैं। कुछ कुशल संपादक होते हैं। कुछ सफल प्रशासक होते हैं। कुछ प्रेरक संगठनकर्ता होते हैं। दादा कैलाशचंद्र पंत इन सभी भूमिकाओं का अद्भुत समन्वय थे।

उन्होंने लिखा भी, संपादित भी किया, संस्थाएँ भी बनाईं और सबसे बढ़कर मनुष्यों का निर्माण किया। उन्होंने वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मान दिया, किंतु नवोदित लेखकों को भी समान आत्मीयता से अपनाया। वे जानते थे कि किसी भाषा का भविष्य केवल उसके महान लेखकों पर नहीं, बल्कि उसकी अगली पीढ़ी पर निर्भर करता है।

इसीलिए वे युवा संपादकों, शोधार्थियों, पत्रकारों और हिंदी प्रचारकों का उत्साहवर्धन करते थे। किसी नए प्रयास में यदि उन्हें ईमानदारी दिखाई देती, तो वे उसे अपनी शक्ति भर सहयोग देते। मेरे प्रति उनका स्नेह भी इसी व्यापक दृष्टि का एक छोटा-सा उदाहरण था।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि दादा पंत का वास्तविक परिचय उनके पदों या सम्मानों से नहीं, बल्कि उन असंख्य लोगों से मिलता है जिन्हें उन्होंने आगे बढ़ने का साहस दिया। यही कारण है कि हिंदी समाज उन्हें केवल 'पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत' नहीं, बल्कि आत्मीयता से "दादा" कहकर स्मरण करता है।

गुंतकल से भोपाल तक : चार दशकों की आत्मीय यात्रा

यदि किसी महापुरुष के व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल उनके प्रकाशित साहित्य, प्राप्त सम्मानों अथवा संस्थागत उपलब्धियों के आधार पर किया जाए, तो वह अधूरा रह जाता है। किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके व्यवहार, आत्मीयता और संबंधों में प्रकट होती है। दादा कैलाशचंद्र पंत के संदर्भ में यह बात पूर्णतः सत्य सिद्ध होती है। उनके साथ मेरा लगभग चार दशकों का संबंध केवल औपचारिक परिचय नहीं था; वह एक सतत् आत्मीय संवाद था, जिसने मेरे साहित्यिक, पत्रकारिक और शैक्षणिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

पहली भेंट : जब परिचय आत्मीयता में बदल गया

विगत शताब्दी के नौवें दशक की बात है। उस समय मैं आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जनपद के गुंतकल नगर में हिंदी प्रचारक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा था। समानांतर रूप से पत्रकारिता, साहित्यिक गतिविधियों और हिंदी प्रचार-प्रसार के विविध कार्यक्रमों में सक्रिय था। दक्षिण भारत में हिंदी के लिए कार्य करना उस समय चुनौतीपूर्ण भी था और प्रेरणादायक भी।

इसी काल में पहली बार दादा कैलाशचंद्र पंत से निकट परिचय का अवसर मिला।

वे मध्यप्रदेश से दक्षिण भारत की यात्रा पर आए थे और गुंतकल होते हुए कर्नाटक के बल्लारी पहुँचे। वहीं से उनके साथ विश्वविख्यात ऐतिहासिक नगरी हंपी जाने का सौभाग्य मिला।

आज भी वह यात्रा स्मृतियों में अक्षुण्ण है।

हंपी के भग्नावशेषों के बीच चलते हुए वे केवल स्थापत्य नहीं देख रहे थे; वे भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के उन अध्यायों को पढ़ रहे थे जो पत्थरों में अंकित थे। विजयनगर साम्राज्य, भारतीय सांस्कृतिक एकता, दक्षिण भारत की साहित्यिक परंपरा और भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंधों पर उनकी टिप्पणियाँ आज भी मेरे स्मृति-पटल पर अंकित हैं।

यात्रा समाप्त हुई, किंतु संवाद प्रारंभ हुआ।

वह संवाद अगले लगभग चार दशकों तक निरंतर चलता रहा।

पत्रों से निर्मित आत्मीय संबंध

आज की पीढ़ी के लिए यह विश्वास करना कठिन होगा कि एक समय ऐसा भी था जब संबंध मोबाइल फ़ोन, ई-मेल और सोशल मीडिया से नहीं, बल्कि पत्रों से जीवित रहते थे।

दादा पंत उसी परंपरा के प्रतिनिधि थे।

वे पत्र लिखते नहीं थे, वे संवाद रचते थे।

उनके पत्रों में औपचारिकता नहीं होती थी। उनमें आत्मीयता होती थी। समाचार भी होते थे, विचार भी; योजनाएँ भी होती थीं, प्रेरणा भी; समीक्षा भी होती थी और स्नेह भी।

आज भी उनके अनेक पत्र मेरे अभिलेखों में सुरक्षित हैं। प्रत्येक पत्र अपने समय का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

उन पत्रों को पढ़ते हुए सहज ही अनुभव होता है कि दादा पंत किसी एक व्यक्ति को नहीं लिख रहे; वे हिंदी के भविष्य पर विचार कर रहे हैं।

उनकी चिट्ठियाँ साहित्यिक संवाद की उस परंपरा की प्रतिनिधि हैं जो आज लगभग लुप्त होती जा रही है।

विश्व हिंदी सम्मेलन के पत्र : इतिहास का जीवंत दस्तावेज़

दादा पंत विश्व हिंदी सम्मेलनों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। किंतु उनकी विशेषता यह थी कि वे सम्मेलन से लौटकर केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं लिखते थे।

वे विस्तार से बताते थे—

सम्मेलन में क्या हुआ।

किन विषयों पर चर्चा हुई।

विश्व के विभिन्न देशों में हिंदी की क्या स्थिति है।

भविष्य की चुनौतियाँ क्या हैं।

भारत को क्या करना चाहिए।

मुझे आज भी विशेष रूप से वह विस्तृत पत्र स्मरण है जो उन्होंने 2–4 दिसंबर 1993 को मॉरीशस के पोर्ट लुई में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन से लौटकर लिखा था।

वह केवल एक पत्र नहीं था; वह विश्व हिंदी आंदोलन का एक जीवंत दस्तावेज़ था।

उस पत्र को आधार बनाकर मैंने 'केरल भारती' में एक विस्तृत लेख लिखा। आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह लेख वस्तुतः दादा पंत की अंतरराष्ट्रीय दृष्टि का परिचय था।

'जनधर्म' : एक संपादक का विश्वास

पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले किसी भी युवा लेखक के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता होती है—एक विश्वास करने वाला संपादक।

मेरे लिए वह विश्वास दादा कैलाशचंद्र पंत थे।

गुंतकल से प्रेषित समाचार, लेख और टिप्पणियाँ वे नियमित रूप से जनधर्म में प्रकाशित करते थे।

उस समय दक्षिण भारत से हिंदी में समाचार भेजना कोई साधारण बात नहीं थी।

संचार के साधन सीमित थे।

डाक व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता था।

समाचारों के प्रकाशन में समय लगता था।

किंतु दादा पंत ने कभी दूरी को बाधा नहीं बनने दिया।

उन्होंने मेरी रचनाओं को केवल स्थान ही नहीं दिया, बल्कि महत्त्व भी दिया।

एक युवा पत्रकार के लिए इससे बड़ा प्रोत्साहन और क्या हो सकता था?

आज भी मैं मानता हूँ कि यदि उस समय उनका विश्वास और प्रोत्साहन न मिला होता, तो संभवतः मेरी पत्रकारिता की दिशा कुछ और होती।

'युग मानस' : एक पत्रिका, एक विश्वास

सन् 1996 मेरे साहित्यिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण वर्ष था।

गुंतकल से हिंदी साहित्यिक पत्रिका 'युग मानस' का मुद्रित प्रवेशांक प्रकाशित होने जा रहा था।

यह एक साहसिक प्रयास था।

हिंदीतर भाषी प्रदेश के एक छोटे नगर से हिंदी की गंभीर साहित्यिक पत्रिका निकालना अनेक लोगों को असंभव-सा लगता था।

मैंने देशभर के वरिष्ठ साहित्यकारों से आशीर्वचन और शुभकामना संदेश का अनुरोध किया।

दादा कैलाशचंद्र पंत का संदेश आज भी मेरे लिए किसी सम्मान-पत्र से कम नहीं है।

उन्होंने लिखा—

"मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि आप अहिंदी भाषी होते हुए भी एक साहसिक प्रयास कर रहे हैं…"

इन शब्दों का मूल्य केवल इसलिए नहीं है कि वे एक वरिष्ठ साहित्यकार ने लिखे थे।

उनका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी की संभावनाओं पर विश्वास व्यक्त किया।

उन्होंने यह नहीं देखा कि पत्रिका कहाँ से निकल रही है।

उन्होंने यह देखा कि उसके पीछे उद्देश्य क्या है।

'युग मानस' की लगभग तीन दशक की यात्रा को जब आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अनुभव होता है कि उसके प्रारंभिक चरण में दादा पंत जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी था।

आज भी 'युग मानस' के वेब पृष्ठों में प्रत्येक नई रचना से पत्रिका सज्जित होती है, तो प्रवेशांक के लिए लिखे गए उनके वे शब्द स्मृति में गूँज उठते हैं।

वास्तव में, किसी पत्रिका का सबसे बड़ा पुरस्कार उसका प्रसार नहीं, बल्कि ऐसे मनीषियों का विश्वास होता है।

उत्तर और दक्षिण के बीच एक जीवंत सेतु

दादा कैलाशचंद्र पंत का व्यक्तित्व मुझे सदैव इसलिए भी विशेष लगा कि उन्होंने कभी हिंदी को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बाँधा।

वे दक्षिण भारत को 'अहिंदी क्षेत्र' नहीं कहते थे।

वे उसे हिंदी की भावी संभावनाओं का क्षेत्र मानते थे।

जब भी दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार, पत्रकारिता, भाषा-प्रौद्योगिकी अथवा नए शैक्षणिक प्रयोगों की चर्चा होती, उनकी आँखों में उत्सुकता दिखाई देती।

वे मानते थे कि हिंदी का भविष्य केवल उत्तर भारत में नहीं, बल्कि पूरे भारत की सहभागिता में निहित है।

आज जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भारतीय भाषाओं और बहुभाषिक शिक्षा पर व्यापक चर्चा हो रही है, तब दादा पंत की यह दूरदृष्टि और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।

भोपाल की यात्राएँ : हिंदी भवन का आत्मीय संसार

जहाँ संस्था, साहित्य और संबंध एकाकार हो जाते थे

गुंतकल की पहली भेंट से आरंभ हुआ आत्मीय संबंध समय के साथ और अधिक प्रगाढ़ होता गया। वर्षों बीतते गए, माध्यम बदलते गए, देश में संचार-क्रांति आ गई, पत्रों का स्थान दूरभाष, ई-मेल और अंततः डिजिटल माध्यमों ने ले लिया; परंतु दादा कैलाशचंद्र पंत के व्यवहार में कभी परिवर्तन नहीं आया। संवाद की आत्मीयता वही रही, अपनापन वही रहा और हिंदी के प्रति उनकी साधना भी उतनी ही अविचल रही।

जब-जब भोपाल जाने का अवसर मिला, हिंदी भवन पहुँचना मानो एक आत्मीय तीर्थ पर जाने जैसा अनुभव होता था। हिंदी भवन मेरे लिए केवल एक संस्थान नहीं था; वह हिंदी-जगत् का जीवंत मिलन-केंद्र था। वहाँ प्रवेश करते ही देश के किसी-न-किसी भाग से आए लेखक, शोधार्थी, पत्रकार, शिक्षक अथवा हिंदी-सेवी से भेंट हो जाती। दादा पंत की उपस्थिति उस पूरे वातावरण को एक परिवार का रूप दे देती थी।

उनके कक्ष का द्वार प्रायः खुला रहता था। कोई युवा शोधार्थी अपनी पांडुलिपि लेकर आता, कोई वरिष्ठ साहित्यकार किसी योजना पर विचार-विमर्श करने पहुँचता, कोई पत्रकार समसामयिक प्रश्नों पर चर्चा करना चाहता, तो कोई हिंदी प्रचारक किसी कार्यक्रम के लिए मार्गदर्शन लेने आता। आश्चर्य यह था कि दादा पंत प्रत्येक व्यक्ति को समान धैर्य और सम्मान के साथ सुनते थे। उनके पास समय कम होता था, परंतु किसी को यह अनुभव नहीं होने देते थे कि वे व्यस्त हैं।

यही किसी संस्थान के वास्तविक नेतृत्व की पहचान होती है।

चिंतन और व्यक्तित्व की गतिशीलता : आधुनिकता, वैज्ञानिकता के प्रति प्रतिबद्धता

कैलाशचंद्र पंत जी केवल साहित्य, संस्कृति या भाषा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही नहीं थे, बल्कि अत्यंत गतिशील, वैज्ञानिक दृष्टि और प्रगति प्रति प्रतिबद्ध व्यक्ति थे ।  जब उन्होंने नब्बे के दशक में कंप्यूटर पर उंगलियाँ चलाते मुझे देखा तो उन्होंने बड़ी जिज्ञासा से कई सवाल पूछे ।  तब से वे चाहते थे कि, जब भी संभव हो, हमारी मुलाक़ात हो, जिस समय वे वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी, नवाचार के दृष्टिकोण से चर्चा हो ।

एक बार दिल्ली से मेरी वापसी के दौरान चूँकि रेल गाड़ी भोपाल से होते हुए आगे जाती थी, मेरे चिट्टी पाकर उन्होंने दूरभाष पर तुरंत आग्रह किया कि आप भोपाल जरूर उतर जाइए ।  दक्षिण से उत्तर की ओर यात्रा और वापसी यात्रा के दौरान जब भी संभव हो मैं उनसे मिलता था, या दूरभाषा पर संवाद या पत्राचार अवश्य होता था ।  वे अंतर्जाल के विकास के दौर में ई-मेल से भी (हिंदी भवन के ई-मेल के पते से) पत्राचार करते थे ।  महेंद्र कार्तिकेय जी का समकालीन साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन 1996 के अंतिम महीनों में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में आयोजित हो रहा था ।  आमंत्रित वक्ता के रूप में हैदराबाद पहुँचते ही उन्होंने आयोजक से सवाल किया था कि अन्य आमंत्रित कौन-कौन हैं ।  जब उनके सामने पेश सूची में सी. जय शंकर बाबु का नाम नहीं था, उन्होंने सम्मेलन के संयोजक से निराशा जतायी थी ।  जब महेंद्र कार्तिकेय जी ने मुझे फोन पर आमंत्रित  किया कि हैदराबाद में कल से तीन दिन का सम्मेलन आयोजित हो रहा है, आप अवश्य पधारिए, मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैं उन्हें नहीं जानता था ।  अगले दिन हैदराबाद पहुँचने पर पता चला कि दादा कैलाशचंद्र पंत सहित कई अतिथियों के सवाल और आग्रह पर आकस्मिक निमंत्रण मुझे मिला था ।  

कंप्यूटर में पुराने फांट की जगह यूनिकोड के प्रयोग से तमाम भाषाओं में हर कोई आसानी टंकण कर पाने की बात जब वर्ष 2000 में उन्हें पता चला तो उन्होंने तुरंत आग्रह किया कि मैं उन्हें तथा हिंदी भवन के कर्मियों को प्रशिक्षण दूँ ।

वे लगातार मुझे परामर्श देते थे और मुझसे भी आधुनिक विषयों पर हिंदी भवन व्यख्यानों के लिए आग्रह करते थे ।  पावस व्याख्यान माला में व्याख्यान के लिए कई बार उन्होंने मुझे आमंत्रित किया, चाहकर भी, यहाँ तक कि एकाध बार घर से निकल कर भी अपरिहार्य कारणों से भोपाल नहीं पहुँच पाया था । हिंदी सेवा सम्मानों के लिए योग्य संस्थाओं और व्यक्तियों के चयन में वे लगातार मेरी राय व संस्तुति लेते थे ।  हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रति समर्पण भावना ने मुझे इस योग्य साबित किया कि वे हमेशा मुझे आत्मीयता और भरपूर स्नेह देते थे ।

कोरोना के दौर में मेरा फोन नंबर बदलने से वे आखिर फेसबुक के माध्यम मेसेंजर पर संदेश भेजकर मुझसे आग्रह किया था कि मैं हिंदी भवन, भोपाल पहुँच कर अवश्य व्याख्यान दूँ ।  व्याख्यान से पूर्व और बाद भी ऑनलाइन शिक्षण में मेरी सक्रिया और भाषा-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मेरे कार्यों के संबंध में काफ़ी जिज्ञासा के साथ चर्चा की ।  उन्हीं विषयों के आधार पर दक्षिण में हिंदी के विकास के नवीनतम आयामों पर मुझे लिखने और बोलने के लिए प्रेरित करते रहें ।

हिंदी भवन : ईंटों का नहीं, विश्वास का निर्माण

संस्थाओं का मूल्यांकन प्रायः उनके भवन, बजट या कार्यक्रमों से किया जाता है; किंतु हिंदी भवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वातावरण था। उस वातावरण का निर्माण दादा कैलाशचंद्र पंत ने वर्षों की साधना से किया था।

उन्होंने हिंदी भवन को केवल साहित्यिक आयोजनों का स्थल नहीं रहने दिया; उसे उन्होंने विचारों, संस्कृतियों और पीढ़ियों के संवाद का केंद्र बना दिया। वहाँ आयोजित व्याख्यानमालाएँ, संगोष्ठियाँ, पुस्तक-चर्चाएँ, कवि-गोष्ठियाँ और शोधपरक कार्यक्रम किसी औपचारिक परंपरा का निर्वाह नहीं थे; वे हिंदी की जीवंत सांस्कृतिक चेतना के उत्सव थे।

मुझे अनेक अवसरों पर वहाँ उपस्थित होने का सौभाग्य मिला। प्रत्येक यात्रा के बाद यह अनुभूति और अधिक प्रबल हुई कि दादा पंत ने एक भवन का संचालन नहीं किया, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा का निर्माण किया जिसमें आने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सहभागी अनुभव करता था।

परामर्शदाता भी, शुभचिंतक भी

हमारे बीच संबंध केवल पत्राचार या औपचारिक भेंटों तक सीमित नहीं थे।

विभिन्न साहित्यिक, पत्रकारिक और शैक्षणिक विषयों पर समय-समय पर उनका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा। अनेक अवसरों पर वे स्वयं दूरभाष पर चर्चा करते, नई योजनाओं के विषय में पूछते और अपने सुझाव देते। कभी मैं उनसे परामर्श लेता, तो कभी वे दक्षिण भारत में हिंदी की स्थिति, नई गतिविधियों या शैक्षणिक प्रयोगों के बारे में विस्तार से जानना चाहते।

यह संवाद एकतरफा नहीं था; यह दो दिशाओं में प्रवाहित होने वाला बौद्धिक और आत्मीय संबंध था।

दादा पंत की यही विशेषता थी कि वे वरिष्ठता का प्रदर्शन नहीं करते थे। वे संवाद में विश्वास करते थे। उनके लिए विचारों का आदान-प्रदान किसी पदानुक्रम का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक साधना का माध्यम था।

'अक्षरा' और 'जनधर्म' : सतत् संवाद के सेतु

दादा पंत नियमित रूप से जनधर्म और बाद के वर्षों में अक्षरा के अंक भेजते थे। यह केवल पत्रिका भेजने की औपचारिकता नहीं थी; यह एक मौन निमंत्रण होता था—"इसे पढ़िए, इस पर विचार कीजिए, और हिंदी के व्यापक परिदृश्य से जुड़े रहिए।"

उनके संपादन में प्रकाशित सामग्री पढ़ते हुए सदैव यह अनुभव होता था कि वे साहित्य को समाज से काटकर नहीं देखते थे। उनके लिए साहित्य, पत्रकारिता, संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्रीय जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए आयाम थे।

एक संपादक के रूप में उनका यह समन्वित दृष्टिकोण आज भी अनुकरणीय है।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और मेरा व्याख्यान

दादा पंत का स्नेह केवल शब्दों तक सीमित नहीं था; वे उसे अवसरों में बदलना जानते थे।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल द्वारा आयोजित विभिन्न व्याख्यानमालाओं में उन्होंने समय-समय पर मुझे व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। यह मेरे लिए केवल आमंत्रण नहीं, बल्कि उनके विश्वास का प्रमाण था।

उनके विशेष आग्रह पर 17 मार्च 2024 को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल में आयोजित बसंत व्याख्यानमाला में मुझे "दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के अद्यतन रूप" विषय पर व्याख्यान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी आलोचना और साहित्य-जगत् के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफेसर सूर्यप्रसाद दीक्षित ने की।

उस दिन मंच पर बैठे दादा पंत के चेहरे पर जो संतोष था, वह आज भी स्मृतियों में अंकित है। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे केवल एक व्याख्यान का आयोजन नहीं कर रहे हों, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच हिंदी के संवाद को एक नई दिशा दे रहे हों।  भोपाल के कई दिग्गजों को उन्होंने उस अवसर पर विद्वानों-श्रोताओं के रूप में आमंत्रित किया था ।

व्याख्यान के उपरांत भी उन्होंने विस्तार से चर्चा की। दक्षिण भारत में हिंदी के नवीन स्वरूपों, तकनीकी विकास, डिजिटल माध्यमों और नई पीढ़ी की भूमिका पर उनकी जिज्ञासा उल्लेखनीय थी। नब्बे वर्ष की आयु के निकट पहुँच चुके इस वरिष्ठ हिंदी-सेवी की वैचारिक ताजगी देखकर मैं सचमुच अभिभूत था।





पद्मश्री के बाद भी वही सरलता

जीवन में अनेक सम्मान व्यक्ति के व्यक्तित्व को बदल देते हैं; किंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सम्मान की गरिमा को बढ़ा देते हैं।

दादा कैलाशचंद्र पंत उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में थे।

भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत होने के पश्चात भी उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। वही सहज मुस्कान, वही आत्मीय संबोधन, वही विनम्रता और वही कर्मनिष्ठा।

उन्होंने कभी अपने सम्मान को अपने व्यक्तित्व का केंद्र नहीं बनने दिया। उनके लिए सम्मान यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का एक नया चरण था।

शायद यही कारण है कि लोग उन्हें उनके अलंकरण से कम और उनके आत्मीय संबोधन—"दादा"से अधिक याद करते हैं।

डिजिटल युग में भी अद्भुत सक्रियता

जीवन के अंतिम वर्षों तक उनकी सक्रियता अप्रतिम थी। वे समसामयिक विषयों पर लिखते रहे, विचार साझा करते रहे और विभिन्न माध्यमों से संवाद बनाए रखे। कुछ ही समय पूर्व महाराष्ट्र की भाषायी और सांस्कृतिक स्थिति पर उनके द्वारा साझा किया गया एक विचारोत्तेजक लेख प्राप्त हुआ था। उसे पढ़कर यह विश्वास और दृढ़ हुआ कि उनके भीतर का पत्रकार, चिंतक और राष्ट्र-मन कभी वृद्ध नहीं हुआ।

उनके लिए आयु केवल शरीर की थी; विचार सदैव युवा रहे।

व्यक्ति से बढ़कर आत्मीय उपस्थिति

आज जब मैं उन चार दशकों को स्मरण करता हूँ, तो अनुभव होता है कि दादा पंत मेरे जीवन में केवल एक वरिष्ठ साहित्यकार या संपादक नहीं थे। वे एक ऐसे शुभचिंतक थे जिन्होंने समय-समय पर मेरे प्रयासों का उत्साहवर्धन किया, मुझे व्यापक हिंदी-जगत् से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह विश्वास जगाया कि यदि उद्देश्य स्पष्ट हो और साधना ईमानदार हो, तो भौगोलिक दूरी कभी बाधा नहीं बनती।

उनकी स्मृति आज भी मेरे लिए प्रेरणा है।

जब भी 'युग मानस' का अंक हाथ में आता है, जब भी हिंदी के किसी नए उपक्रम की योजना बनती है, जब भी दक्षिण भारत में हिंदी के भविष्य पर विचार करता हूँ, दादा पंत के वे आत्मीय शब्द अनायास स्मृति में उभर आते हैं। वे आज भी मार्गदर्शक की तरह साथ चलते प्रतीत होते हैं।

दादा पंत में मैंने क्या देखा : व्यक्तित्व की वह ऊँचाई जो पदों से नहीं मापी जा सकती

लगभग चार दशकों के आत्मीय संपर्क में मैंने दादा कैलाशचंद्र पंत के अनेक रूप देखे—पत्रकार, संपादक, आयोजक, संस्थान-निर्माता, चिंतक, वक्ता और हिंदी-सेवी। परंतु यदि कोई मुझसे पूछे कि उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी, तो मैं बिना किसी संकोच के कहूँगा—उनकी मनुष्यता।

आज के समय में जब व्यक्ति प्रायः अपने पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों के आधार पर पहचाना जाता है, दादा पंत मनुष्यों को उनके पद से नहीं, उनके प्रयत्न से पहचानते थे। वे यह नहीं पूछते थे कि सामने वाला कितना प्रसिद्ध है; वे यह देखते थे कि वह कितना समर्पित है। यही कारण था कि हिंदी के वरिष्ठतम विद्वानों के बीच बैठने वाला यह व्यक्तित्व दक्षिण भारत के एक युवा हिंदी प्रचारक और पत्रकार के प्रयासों को भी उसी आत्मीयता से प्रोत्साहित करता था।

उनकी दृष्टि में हिंदी किसी भूगोल की भाषा नहीं थी; वह भारतीयता की साझा अभिव्यक्ति थी। इसलिए वे उत्तर और दक्षिण के बीच कोई विभाजन नहीं देखते थे। उनके लिए हिंदी की सेवा जहाँ भी हो रही हो, वह सम्मान की अधिकारी थी।

उनकी विनम्रता भी अद्भुत थी। पद्मश्री जैसा राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने के बाद भी उनके व्यवहार में रत्ती भर परिवर्तन नहीं आया। वे पहले भी सहज थे, बाद में भी सहज रहे। सम्मान उनके व्यक्तित्व पर आरोपित नहीं था; वह उनके जीवन की स्वाभाविक परिणति था।

दादा पंत : संबंधों के शिल्पी

यदि मुझे उनके जीवन का एक सूत्र-वाक्य चुनना हो, तो मैं कहूँगा—

"उन्होंने संस्थाएँ बनाने से पहले संबंध बनाए।"

यही उनके संगठन-कौशल का रहस्य था।

वे जानते थे कि किसी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके भवन, उसके संसाधन या उसके नियम नहीं होते; उसकी शक्ति वे लोग होते हैं, जो उससे आत्मीय रूप से जुड़े रहते हैं।

हिंदी भवन इसी दर्शन का मूर्त रूप था।

उन्होंने वहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह अनुभव कराया कि वह केवल अतिथि नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य है। यही कारण था कि हिंदी भवन केवल एक कार्यालय नहीं रहा; वह हिंदी-जगत् का सांस्कृतिक गृह बन गया।

आज जब संस्थाएँ बढ़ रही हैं और आत्मीयता घट रही है, दादा पंत का यह जीवन-दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।

पत्रों की वह परंपरा जो अब इतिहास बन रही है

मेरी पीढ़ी सौभाग्यशाली है कि उसने पत्र-लेखन की उस आत्मीय संस्कृति को निकट से देखा है, जिसके प्रतिनिधि दादा कैलाशचंद्र पंत थे।

उनके पत्र केवल कुशलक्षेम नहीं होते थे।

वे विचारों का विस्तार होते थे।

वे योजनाओं का प्रारूप होते थे।

वे हिंदी-जगत् की गतिविधियों का जीवंत दस्तावेज़ होते थे।

वे प्रोत्साहन के स्रोत होते थे।

विश्व हिंदी सम्मेलनों से लौटकर लिखे गए उनके विस्तृत पत्रों में केवल घटनाओं का विवरण नहीं होता था; उनमें भविष्य की दिशा होती थी। मॉरीशस (1993) से लौटकर लिखा गया उनका पत्र आज भी मेरे लिए विश्व हिंदी आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। उसी ने मुझे 'केरल भारती' के लिए एक विस्तृत लेख लिखने की प्रेरणा दी।

आज जब तत्काल संदेशों का युग है, तब दादा पंत के वे पत्र हमें स्मरण कराते हैं कि संवाद का मूल्य उसकी गति में नहीं, उसकी गहराई में होता है।

दादा पंत से मैंने क्या सीखा

मनुष्य अपने गुरुओं से केवल ज्ञान नहीं पाता; वह जीवन-दृष्टि भी प्राप्त करता है। दादा कैलाशचंद्र पंत के साथ मेरे लंबे संबंध ने मुझे अनेक अमूल्य शिक्षाएँ दीं।

मैंने उनसे सीखा—

  • कि भाषा की सेवा आजीवन साधना है, अल्पकालिक परियोजना नहीं।
  • कि संस्था व्यक्ति से बड़ी होती है।
  • कि संपादक का पहला दायित्व नई प्रतिभाओं को अवसर देना है।
  • कि पत्रकारिता का आधार निर्भीकता है, किंतु उसकी आत्मा उत्तरदायित्व है।
  • कि पत्राचार केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि संबंधों की संस्कृति है।
  • कि हिंदी का भविष्य पूरे भारत की साझी भागीदारी में निहित है।
  • कि सम्मान विनम्रता को और अधिक गहरा बनाना चाहिए।
  • और सबसे बढ़कर—कर्म ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान है।

हिंदी की संस्थागत चेतना के अंतिम महापुरुषों में एक

हिंदी का आधुनिक इतिहास केवल महान लेखकों का इतिहास नहीं है; वह उन व्यक्तित्वों का भी इतिहास है जिन्होंने संस्थाओं का निर्माण किया, पीढ़ियों को जोड़ा और साहित्यिक संस्कृति को जीवित रखा।

पंडित मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, पुरुषोत्तमदास टंडन, सेठ गोविंददास, काका कालेलकर, बैजनाथ प्रसाद दुबे जैसी विभूतियों ने जिस संस्थागत परंपरा को आगे बढ़ाया, उसी परंपरा की उत्तरवर्ती कड़ी के रूप में दादा कैलाशचंद्र पंत का नाम आदर से लिया जाएगा। उन्होंने अपने पूर्वजों से मिली धरोहर को केवल सुरक्षित नहीं रखा; उसे विस्तार दिया, उसे समकालीन बनाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने स्वयं को किसी एक विधा तक सीमित नहीं किया। पत्रकारिता, साहित्य, संगठन, संपादन, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, राष्ट्रभाषा आंदोलन, युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन—इन सभी क्षेत्रों में उनका योगदान समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

ऐसे व्यक्तित्व विरले होते हैं।

दादा चले गए, दिशा छोड़ गए

1 अगस्त 2026 को दादा कैलाशचंद्र पंत का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनकी जीवन-साधना आज भी हिंदी-जगत् की सामूहिक चेतना में स्पंदित है। हिंदी भवन की दीवारें उनकी स्मृतियों को संजोए रहेंगी। जनधर्म के संपादकीय उनकी निर्भीक पत्रकारिता का साक्ष्य देते रहेंगे। अक्षरा का प्रत्येक अंक उनकी साहित्यिक दृष्टि का परिचायक बना रहेगा।

और मेरे लिए...

जब भी युग मानस का नया अंक प्रकाशित होगा, प्रवेशांक के लिए उनके लिखे वे शब्द अनायास स्मरण हो आएँगे—

"मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि आप अहिंदी भाषी होते हुए भी एक साहसिक प्रयास कर रहे हैं..."

समय बदल गया। माध्यम बदल गए। हिंदी की चुनौतियाँ भी बदल गईं। किंतु वे शब्द आज भी उतने ही प्रेरक हैं, जितने लगभग तीन दशक पहले थे। वे केवल युग मानस के लिए शुभकामना नहीं थे; वे दक्षिण भारत में हिंदी के भविष्य के प्रति उनके अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थे।

दादा पंत का जाना मेरे लिए केवल एक वरिष्ठ साहित्यकार का निधन नहीं है; यह एक आत्मीय अभिभावक, एक मार्गदर्शक और एक प्रेरणास्रोत से बिछुड़ने का क्षण है। फिर भी संतोष इस बात का है कि उनका जीवन स्वयं एक प्रकाश-स्तंभ है। जो भी हिंदी की सेवा को जीवन का उद्देश्य मानकर आगे बढ़ेगा, उसे उस प्रकाश से दिशा मिलती रहेगी।

अंत में, मैं उनके श्रीचरणों में अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए केवल इतना ही कहना चाहता हूँ—

"दादा, आपने हमें केवल हिंदी से प्रेम करना नहीं सिखाया; आपने हमें हिंदी के लिए जीना सिखाया।"

आपकी स्मृतियाँ, आपका स्नेह, आपका विश्वास और आपका आशीर्वाद सदैव हमारे साथ रहेगा।

विनम्र श्रद्धासुमन।

स्मृति-स्रोत

  • डॉ. सी. जय शंकर बाबु एवं दादा कैलाशचंद्र पंत के मध्य निजी पत्राचार (1990–2026) और 2011 से ई-मेल व 2024 से मोबाइल / वाट्सैप संपर्क ।
  • युग मानस (प्रवेशांक, 1996) में प्रकाशित शुभकामना संदेश
  • जनधर्म  में प्रकाशित लेख एवं समाचार
  • अक्षरा के विविध अंक
  • राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल के अभिलेख
  • हिंदी भवन, भोपाल के कार्यक्रम एवं संस्मरण
  • लेखक की निजी डायरी, दस्तावेज़ एवं छायाचित्र
  • विश्व हिंदी सम्मेलन (पोर्ट लुई, मॉरीशस, 1993) संबंधी पत्राचार
  • युग मानस YUG MANAS: पत्रकारिता विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय प्रेस दिवस का आयोजन