Tuesday, September 29, 2009
कविता
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हृदय काश पत्थर का होता - महेश चंद्र गुप्त खलिश दर्द की ऐसे घात न होती नैनों से बरसात न होती ठंडी सहमी रात न होती हृदय काश पत्थर का होता दुनि...
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