Thursday, April 30, 2009
कविता
›
बूढे सपने ! - प्रदीप पाठक वो देखो ! गाँव की मस्जिद. आज भी नमाज़ को तरस रही है. फूलों के पेड़ - बच्चो के स्कूल, सब सुने पड़े हैं. लगत...
‹
›
Home
View web version